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सोमवार, 1 मई 2017

गिद्ध ग्रास

निरंतर शोषण से मर्माहत होकर
अंतिम सांसें गिनने लगा है श्रम
दुखी होकर शोषित पसीना  
सिसकने लगा छिली त्वचा पर
दिन प्रतिदिन  
सभी सीमाएं लांघने लगा शोषण
और होने लगा गिद्धों का जमावड़ा

उखड़ती सांसों को समेटते हुए श्रम
हो रहा है अश्रुपूरित
होता जा रहा है समाप्त
शोषित पसीने से नमक
खून तो पहले ही चूसा जा चुका है
प्रतीक्षा कर कर रहा गिद्धों का झुंड  
कि शव में कब परिवर्तित हो श्रम
ताकि बनाया जा सके अपना ग्रास  
और नोंच खाएं उसका अंग प्रत्यंग

एक दिन
उधार की सांसें भी गंवा देता है श्रम
टूट पड़ते हैं गिद्ध उसकी लाश पर
और उसे अपना ग्रास बना कर
एकजुट होकर नोंच खाने के बाद  
उड़ जाते हैं नए शव की तलाश में !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)  




 

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