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शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

मसले वादे

मसलों से जुड़े वादों को
पूरा होते कभी न देखा 
सिर्फ चलती है जुबान
जुबान का पक्का न देखा
आसमां पर उछलते वादे
जमीं पर ठहरते न देखा
मज़लिसों में किए वादे  
अवाम में फलते न देखा
भूख प्यास वाले मसले
सुलझते कभी न देखा 
दिखाए गए कई सपने
सच में बदलते न देखा

बातदबीरों को मजमे में
सच्ची बातें करते न देखा 
ख़ुदगर्जों की इस भीड़ में
जमीर वाला कोई न देखा
मुदब्बिरों की जमात में
ईमानदार चेहरा न देखा 
सियासतदां की आंखों में
सच्चे आंसू कभी न देखा  
तख़्तनशीन होने के बाद
वादे निभाते कभी न देखा 
मुक़तदिर हो जाने के बाद
मुक़द्दस होते कभी न देखा ! 

@ दिनेश ठक्कर बापा  
(चित्र गूगल से साभार)



 

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