अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

रविवार, 23 अप्रैल 2017

धारोधार रोती धरती

चिमनी और सोखक
उलझ रहे थे आपस में
कि क्षमता किसमें अधिक
जो सोख सके पूरा पानी
नदियों और तालाबों का
कर सके देह निर्वसन 
और छोड़ दे मरने प्यासा


कुल्हाड़ी और आरी
काट रहे थे परस्पर
एक दूसरे की बात
हो रहा था विवाद कि
धार किसकी अधिक
जो काट सके जड़ों से
हरियाली धरती की
उसको बना सके ठूंठ
छीन सके प्राण वायु

कुदाल तथा खोदक
खोद रहे थे परस्पर
एक दूसरे का कथन
भिड़ रहे थे आपस में
इस बात बात पर कि
ताकत किसमें ज्यादा
जो कर सके छलनी  
उर्वर सीना धरती का
और दे सके गहरा घाव  

चिमनी और सोखक
कुल्हाड़ी और आरी
कुदाल तथा खोदक
जुटे थे साबित करने
स्वयं को सर्व शक्तिशाली
कर रहे थे वे वाक् युद्ध
मारक मंशा भांप कर        
दुखी असहाय धरती
रो रही थी धारोधार
धरती पर आती विपत्ति
विषम स्थिति जान कर
पर्यावरण नष्ट होता देख
प्रकृति और समय
कर रहे थे निश्चित
जघन्य अपराध का दंड
ताकि दण्डित हो सकें
रोती धरती के अपराधी !

@ दिनेश ठक्कर बापा
( चित्र गूगल से साभार)






    
एक टिप्पणी भेजें