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गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

आपत्ति गूँजती आवाज़ पर

आस्था की हर उद्घोषणाएं
जब अनसुनी हो जाती हैं  
अपने अपने शोरगुल में
तब विद्रोही स्वर गूँजते हैं
अनास्था के ऊँचे शिखर से
शिकवे फतवे के भय वश  
फहर नहीं पाती हैं ध्वजाएं
अपने अपने स्वार्थ वश
भड़कायी जाती है भावनाएं

सुबह शाम होने वाली अजान  
बजने वाले घण्टे और भजन    
भक्तभाव से होने वाले प्रवचन
गूँजते हैं अपने दायरे से बाहर
तब ऊँगली उठती आस्था पर
विवाद उपजता अनास्था पर
तो दब जाता है मूल प्रयोजन
खड़ा हो जाता विरोध का स्वर
तेज हो जाता है सियासी शोर

स्वार्थमय विवादों के बाँगर में
बाँगड़ुओं के कोलाहल के बीच
अब तो मुर्गे भी भोर होने पर
डरने लगे हैं बाँग लगाने से
भलाई समझते हैं चुप रहने में
चिड़ियाँ शाँत रहती हैं पेड़ों पर
डरती सुबह शाम चहचहाने से
क्योंकि
इस समय जताई जा रही है
आपत्ति गूँजती आवाज़ पर !
 
@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)


 


 
 

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