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गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

धुआं धुआं मौत

चिर निद्रा में लीन मौत
चिंताओं से परे चिता पर
गीली लकड़ियों कंडों से
हो रही है धुआं धुआं
और
गीली आंखों से जिंदगी
भड़का रही है आग
जैसे जैसे भड़क रही आग
वैसे वैसे सूखते जा रहे हैं
जिंदगी की आंखों से आंसू

मौत राख में विलीन होने पर
श्मशान में संवेदनाएं रख कर
अहंकारी सिर पर पानी छिड़क
नीम की कुछ पत्तियां चबा कर
और अधिक कड़वा कर मुंह  
जिंदगी पुराने रूख के साथ  
कठोर कदमों के सहारे
लौट आती है कड़वाहट लेकर
अपने निष्ठुर ठौर ठिकाने पर !  

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)
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