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रविवार, 5 मार्च 2017

बयानी वक़्ते बद


चंद सूराख़ क्या हुए हमारी जेब में
रिश्ते सरक गए सिक्के से ज्यादा

आँखें फेर लेते हैं लोग मुफ़लिसी में
पलकों पर वे पहले बैठाते थे ज्यादा

यार रिश्तेदार दुत्कारते हैं कंगाली में
मालामाल रहे तो पुचकारते थे ज्यादा


जहर उगलते हैं अपने ही तंगहाली में
मीठा बोलते थे पहले दूसरों से ज्यादा

ख़ुशामद करते थे हमारी ख़ुशहाली में
इफ़्लास में अल्फ़ाज़ कड़वे हुए ज्यादा

इकराम करते थे लोग जेब भरी रहने में
इकराह करते हैं वे खाली जेब में ज्यादा

हर शाम सुहानी होती थी एहतिशाम में
हिस्से में है अब अंधेरा उजालों से ज्यादा

चंद झुर्रियां क्या झलकी हमारे बदन में
मोटी चमड़ी के हुए अपने गैरों से ज्यादा


उम्र क्या ढली हमारी जो इस वक़्ते बद में
कीमत नहीं रही फ़ुजूल सामान से ज्यादा

सजाया था घर का कोना कोना जवानी में
बेवजूद हुए कोने में ज़िंदा लाश से ज्यादा !
   
@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)  


 




 


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