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मंगलवार, 21 मार्च 2017

मशाल बनती कविता

आसपास के घटनाक्रम
कुलबुलाहट मय माहौल
कसमसाती अनुभूति
छटपटाती अभिव्यक्ति
अपने भीतर मचे द्वन्द
मन मस्तिष्क के विचार
जब कोरे कागज़ पर
सार्थक सोद्देश्य शब्द बन कर
निकलते हैं किसी कलम से
तब आकार लेती है कविता
यदि कोई करता है उस पर
चिंतन मनन खुले दिमाग से
तो जीवंत हो जाती है कविता

मुर्दों में भी हलचल सी मचा देती    
श्मशान सी खामोशी ख़त्म होती
किन्तु
ज़िंदा लोगों की मुट्ठियों में जब  
कस कर तन जाती यह कविता
तब मशाल बन कर
प्रज्वलित होती है यह कविता !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)  
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