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शनिवार, 18 मार्च 2017

बहुमत कभी भी सर्वमत नहीं होता


बहुमत कभी भी सर्वमत नहीं होता
मतान्तर से उपजा यह विरोधाभास
होने नहीं देता गलतियों का आभास
बहुमत पर बहुत सारे सवाल करता
यांत्रिक षडयंत्र का परिणाम बताता
विरोधाभास भी इतना अधिक होता
कि
बहुमत कभी भी सर्वमत नहीं होता

उत्पन्न हुए विरोधाभास को केवल
मतान्तर का परिणाम न माना जाए
अपेक्षाओं के अतिरेक से आंका जाए
यह आंकलन भी करना है आवश्यक
कि
उपेक्षाओं की अधिकता है आत्मघाती  
जनाधार को सतह पर स्वयं ले आती
जनहित में भी है यह अति आवश्यक
बहुमत को सर्वमत भी होने दिया जाए

यह भी मतान्तर का ही है दुष्परिणाम
कि
अल्पमत अतीत में कभी नहीं झांकता
पराजय में छल लगता अल्पमत को
जनादेश को शिरोधार्य भी नहीं करता
सर्वमत होने के आकांक्षी बहुमत को
लोकतंत्र की विजय होना नहीं मानता
सही ठहराता हैं स्वार्थ के गठबंधन को
बढ़ जाती है नकारात्मक मानसिकता
अल्पमत बढ़ाता विरोध की गांठों को
सत्ता के लालच में महागठबंधन होता  
और
बहुमत कभी भी सर्वमत नहीं होता

सर्वमत होने बहुमत का कर्तव्य होता
कि
संविधान अनुसार स्वयं भी कार्य करे
लोकतंत्र को लोकहित में मजबूत करे
सिंहासन पर सन्यासी बैठे या गृहस्थ
सरकार संचालित योगी करे या भोगी
मुखिया के हाथ में कमंडल हो या मंडल
पहने हुए वस्त्रों का रंग चाहे जैसा भी हो
जनता को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता
फर्क पड़ता जब जनता का अहित होता
असर पड़ता है जब सद्भाव समाप्त होता
मतान्तर की तरह भेदभाव भी बढ़ता
तब
बहुमत कभी भी सर्वमत नहीं होता !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)
 
     
 
 
 


   



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