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शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

खूब खिलाइए कमल

तब दिन कितने अच्छे भले थे
जब इस स्वच्छ तालाब का
प्रयोजन करते थे निर्भय होकर
सर्व वर्ग के सहिष्णु भोले मानुष
प्यास बुझाते थे बाघ बकरी भी
क्योंकि
परे था परस्पर आपसी वैमनस्य
नहीं थी लालसा एकाधिकार की
जल ही जीवन था उन सबके लिए
जल है तो कल है यह भी जानते थे
लेकिन एक दिन
डाल दिया डेरा स्वार्थी अमानुषों ने
बढ़ गई आवाजाही आदमखोरों की
फिर पहले जैसे नहीं रहे वह दिन    
फिर गया पानी सबके प्रयासों पर
आखिर हो गया सब कुछ गुड़ गोबर    
त्रस्त हो गए सब भय भूख प्यास से  
और कहने लगे लोग विवश होकर  
जैसे चाहो जब चाहो
खूब खिलाइए कमल
इस छिछले गंदले मैले तालाब में
निर्मल जल प्रदूषित तुमने किया है
समस्त कीचड़ भी तुमने फैलाया है !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

 


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