अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

मंगलवार, 2 मई 2017

उतार चढ़ाव

लाल बत्ती को उन्होंने
सिर से उतार ही दिया
मुखौटा उतारा उन्होंने
सूट बूट भी उतार दिया
शाही शानशौकतजादे
नौकरशाह साहबजादे
सबने ये दिखावा किया

उन्हें जिसने चढ़ा लिया  
वह भ्रष्टाचार था  
उन्हें जिसने अपनाया  
वह मालदार रिश्वत थी  
उन्हें जिसने चिपकाया  
वह रौबदार कुर्सी थी !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

सोमवार, 1 मई 2017

गिद्ध ग्रास

निरंतर शोषण से मर्माहत होकर
अंतिम सांसें गिनने लगा है श्रम
दुखी होकर शोषित पसीना  
सिसकने लगा छिली त्वचा पर
दिन प्रतिदिन  
सभी सीमाएं लांघने लगा शोषण
और होने लगा गिद्धों का जमावड़ा

उखड़ती सांसों को समेटते हुए श्रम
हो रहा है अश्रुपूरित
होता जा रहा है समाप्त
शोषित पसीने से नमक
खून तो पहले ही चूसा जा चुका है
प्रतीक्षा कर कर रहा गिद्धों का झुंड  
कि शव में कब परिवर्तित हो श्रम
ताकि बनाया जा सके अपना ग्रास  
और नोंच खाएं उसका अंग प्रत्यंग

एक दिन
उधार की सांसें भी गंवा देता है श्रम
टूट पड़ते हैं गिद्ध उसकी लाश पर
और उसे अपना ग्रास बना कर
एकजुट होकर नोंच खाने के बाद  
उड़ जाते हैं नए शव की तलाश में !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)  




 

शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

मसले वादे

मसलों से जुड़े वादों को
पूरा होते कभी न देखा 
सिर्फ चलती है जुबान
जुबान का पक्का न देखा
आसमां पर उछलते वादे
जमीं पर ठहरते न देखा
मज़लिसों में किए वादे  
अवाम में फलते न देखा
भूख प्यास वाले मसले
सुलझते कभी न देखा 
दिखाए गए कई सपने
सच में बदलते न देखा

बातदबीरों को मजमे में
सच्ची बातें करते न देखा 
ख़ुदगर्जों की इस भीड़ में
जमीर वाला कोई न देखा
मुदब्बिरों की जमात में
ईमानदार चेहरा न देखा 
सियासतदां की आंखों में
सच्चे आंसू कभी न देखा  
तख़्तनशीन होने के बाद
वादे निभाते कभी न देखा 
मुक़तदिर हो जाने के बाद
मुक़द्दस होते कभी न देखा ! 

@ दिनेश ठक्कर बापा  
(चित्र गूगल से साभार)



 

गुरुवार, 27 अप्रैल 2017

कब ढहेंगे लाल आतंक के गढ़

सवार है नासूर लाल आतंक
सियासत के स्वार्थी कंधे पर
और लाल आतंक के सिर पर
सवार है खून वीर जवानों का
लाल हो रही मिट्टी बरसों से
जवानों के बहाए गए खून से

सियासत का न खौलता खून
पोषित लाल आतंक पर कभी
इसका उबलता है खून केवल
सरहद के घुसपैठी आतंक पर

आपात बैठक में कड़ी निंदा कर  
मुआयना कर मुआवजा देकर  
कोशिश की जाती राजनीतिक
लाल आतंक समाप्त करने की
मोर्चे पर होती रहती है शहादत
मुठभेड़ों में जांबाज़ जवानों की
       
विकास के बहाने पनपा आतंक
बन चुका है विकास का बाधक
लुगरा लंगोटी का कथित दोस्त
बन गया अब जान का दुश्मन
लाल आतंक की जन अदालत
देती मौत का एकतरफा फैसला      
तोड़ती है मुखर जनों का हौंसला
दहशत के आदी हो चुके हैं वासी
हमले में ढाल बनते आदिवासी

कब तक यूं ही होती रहेगी व्यर्थ
मोर्चे पर तैनात साहसी शहादत
कब तक होती रहेगी अपमानित
संवेदनहीन सियासत से शहादत
कब तक होता रहेगा वर्गीकरण
सरहद और सूबे के आतंक का
कब ढहेंगे लाल आतंक के गढ़
जवाब मांग रहे ये ज़िंदा सवाल !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)
       
     

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

मां सरस्वती से कामना

हे मां सरस्वती
अपने पुत्र पर
कृपा करना इतनी
कि मरने से पहले
भले ही न कहलाऊं
पुरस्कृत नामी लेखक
किंतु देते रहना मुझे
ऐसे विचार और शब्द
कि मरने से पहले
पाठकों के लिए मैं
जीवंत छोड़ जाऊं
सार्थक और यथार्थ लेखन

हे मां सरस्वती
इसका नहीं है कोई अफसोस
कि नहीं बन सका क्यों मैं
मां लक्ष्मी का उपासक
नहीं बना लिखे शब्दों से धनी
किंतु अपने पुत्र पर
कृपा करना इतनी
कि बन जाऊं मरने से पहले
सार्थक सच्चे शब्दों का धनी

हे मां सरस्वती
इच्छाओं की अंतिम यात्रा में
उच्चारित हो सृजित शब्द भी
मृत देह की अंत्येष्टि के पश्चात्
गले लगाएं लोग मेरे लेखन को
दीर्घायु बनाएं जीवंत शब्दों को
अंतिम अरदास और उठावना
सार्थक सच्चे शब्दों के साथ हो
चित्र के बदले मेरे कृतित्व पर
शब्दों के श्रद्धा सुमन अर्पित हों
आंखों में अश्रुओं के स्थान पर
मेरे सृजित शब्दों की छवि हो
आंखों से आंसू न छलके बल्कि
जुबां से काव्य गीत निःसृत हो !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

रविवार, 23 अप्रैल 2017

धारोधार रोती धरती

चिमनी और सोखक
उलझ रहे थे आपस में
कि क्षमता किसमें अधिक
जो सोख सके पूरा पानी
नदियों और तालाबों का
कर सके देह निर्वसन 
और छोड़ दे मरने प्यासा


कुल्हाड़ी और आरी
काट रहे थे परस्पर
एक दूसरे की बात
हो रहा था विवाद कि
धार किसकी अधिक
जो काट सके जड़ों से
हरियाली धरती की
उसको बना सके ठूंठ
छीन सके प्राण वायु

कुदाल तथा खोदक
खोद रहे थे परस्पर
एक दूसरे का कथन
भिड़ रहे थे आपस में
इस बात बात पर कि
ताकत किसमें ज्यादा
जो कर सके छलनी  
उर्वर सीना धरती का
और दे सके गहरा घाव  

चिमनी और सोखक
कुल्हाड़ी और आरी
कुदाल तथा खोदक
जुटे थे साबित करने
स्वयं को सर्व शक्तिशाली
कर रहे थे वे वाक् युद्ध
मारक मंशा भांप कर        
दुखी असहाय धरती
रो रही थी धारोधार
धरती पर आती विपत्ति
विषम स्थिति जान कर
पर्यावरण नष्ट होता देख
प्रकृति और समय
कर रहे थे निश्चित
जघन्य अपराध का दंड
ताकि दण्डित हो सकें
रोती धरती के अपराधी !

@ दिनेश ठक्कर बापा
( चित्र गूगल से साभार)






    

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

आपत्ति गूँजती आवाज़ पर

आस्था की हर उद्घोषणाएं
जब अनसुनी हो जाती हैं
अपने अपने शोरगुल में
तब विद्रोही स्वर गूँजते हैं
अनास्था के ऊँचे शिखर से
शिकवे फतवे के भय वश
फहर नहीं पाती हैं ध्वजाएं
अपने अपने स्वार्थ वश
भड़कायी जाती है भावनाएं

सुबह शाम होने वाली अजान
बजने वाले घण्टे और भजन    
भक्तभाव से होने वाले प्रवचन
गूँजते हैं अपने दायरे से बाहर
तब ऊँगली उठती आस्था पर
विवाद उपजता अनास्था पर
तो दब जाता है मूल प्रयोजन
खड़ा हो जाता विरोध का स्वर
तेज हो जाता है सियासी शोर

स्वार्थमय विवादों के बाँगर में
बाँगड़ुओं के कोलाहल के बीच
अब तो मुर्गे भी भोर होने पर
डरने लगे हैं बाँग लगाने से
भलाई समझते हैं चुप रहने में
चिड़ियाँ सहमी रहती पेड़ों पर
डरती सुबह शाम चहचहाने से
क्योंकि
इस समय जताई जा रही है
आपत्ति गूँजती आवाज़ पर !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)






 

सोमवार, 17 अप्रैल 2017

प्यासा निर्धन वर्तमान

देहात के सूखे कुंए के पास
बाल्टी लिए बैठा था उदास
प्यासा निर्धन वर्तमान
सूख गई थी पानी की आस
 
लकवाग्रस्त पगडंडियों से
गुजरता हुआ जल वाहन
देख कर उसने रूकवाया
जल वाहक से प्रश्न किया
किसकी प्यास बुझाओगे
मैंने कौन सा गुनाह किया
मुझे पानी नहीं पिलाओगे
कह कर मूर्छित हो गया  

उसके मुंह पर पानी छिड़क
जल वाहक ने होश में लाया
जख़्मों पर नमक छिड़कते  
कहा - उठो निर्धन वर्तमान
मेरा पानी होश में ला सकता
किंतु प्यास नहीं बुझा सकता
बिकाऊ पानी खरीद न पाओगे
दाम चुकाते तुम दम तोड़ दोगे
धनी प्यासों के लिए है ये पानी
तुम्हें पुकार रहा नाले का पानी            
तुम्हारे नहीं रहे अब नदी बांध
हमारे कब्जे में है उसका पानी
जल वाहक की सुन कर बयानी
रो पड़ा प्यासा निर्धन वर्तमान

इधर
छलकते असहाय आंसू
भर रहे थे खाली बाल्टी
बेज़ार प्यासे वर्तमान की
उधर
बाजार की तरफ चल पड़ा
कारोबारी जल वाहन
छलकाते हुए बिकाऊ पानी

जल वाहन के आते ही उमड़ते
बिकाऊ पानी को खरीदने वाले
पानी का कारोबार देख शासन
नहीं होता है शर्म से पानी पानी
सूख चुका है आंखों का भी पानी !    

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

           

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

जो किसी के नहीं होते

किसको अपना समझें हम
नहीं आ रहा है कुछ समझ
किसके होते हैं ऐसे व्यक्ति
जो किसी के नहीं होते
और तो और
जो स्वयं के भी नहीं होते हैं
ऐसे व्यक्तियों के संबंध में
कुछ भी जानना समझना
इतना आसान भी नहीं है
जितना सोचा करते हैं हम    

पास रह कर भी दूर रहते हैं
मित्र बन कर शत्रु बने रहते
गले लगाओ तो गला काटते
पीठ ठोंको तो खंजर भोंकते
आस्तीन के सांप बने रहते
उन्हें कितना भी समझाओ
समझने को तैयार नहीं होते
कितना भी मीठा खिलाओ
बोल अक्सर कड़वे ही होते
जितने जमीन के ऊपर होते
उतने वे तो भीतर भी रहते  
परछाई देख कर भ्रमित होते
कि खूब लम्बा है उनका कद
क्यों होते हैं ऐसे व्यक्ति
हमारी समझ से परे
वे भी खुद को समझ नहीं पाते
न ही दूसरों को कुछ समझते
उन्हें अच्छी तरह से समझना
स्वार्थी समय में जटिल सा है

बड़े-बुजुर्गों का भी कहना है
कि जो किसी के नहीं होते
वे अंततः कहीं के नहीं रहते
न तो घर के रहते न घाट के !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)
 

शुक्रवार, 14 अप्रैल 2017

कैयाद

कैयाद हरेक आदमी को दग़ा देगा
वो तो वालिदैन को भी धोखा देगा

उसका कीना ही उसका दुश्मन है
दोस्त बन कर वही उसे सज़ा देगा

ज़िंदगी की बंदगी भी करके देखो
उसका अक्स कभी अकड़ने न देगा

खुद से भी दुश्मनी करना छोड़ दो  
दुश्मनों को भी सलीक़ा सुकून देगा

बेईमानी अगर दरकिनार कर दोगे
तो झोली खुदा का बंदा भी भर देगा

ईमानदारी का प्याला जो पी लोगे
दवा बन कर वह हर दर्द मिटा देगा !
   
@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)


(कैयाद = कपटी,  वालिदैन = माता पिता,  कीना = कपट)     

गुरुवार, 13 अप्रैल 2017

धुआं धुआं मौत

चिर निद्रा में लीन मौत
चिंताओं से परे चिता पर
गीली लकड़ियों कंडों से
हो रही है धुआं धुआं
और
गीली आंखों से जिंदगी
भड़का रही है आग
जैसे जैसे भड़क रही आग
वैसे वैसे सूखते जा रहे हैं
जिंदगी की आंखों से आंसू

मौत राख में विलीन होने पर
श्मशान में संवेदनाएं रख कर
अहंकारी सिर पर पानी छिड़क
नीम की कुछ पत्तियां चबा कर
और अधिक कड़वा कर मुंह  
जिंदगी पुराने रूख के साथ  
कठोर कदमों के सहारे
लौट आती है कड़वाहट लेकर
अपने निष्ठुर ठौर ठिकाने पर !  

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

गुरुवार, 30 मार्च 2017

टेढ़ा है पर हमारा है

टेढ़े मेढ़े
आड़े तिरछे
रंग विहीन
नकारात्मक
विचार भर जाते हैं
जब भीतर अपने
तब
मस्तिष्क के अतिरिक्त
सौम्य अंतःकरण भी
हो जाता है विकृत

क्षण प्रति क्षण
छटपटाती रहती हैं
नकारात्मक सोच
कुलांचे मारती है
उत्पन्न विकृतियां
कसमसाते रहते हैं
कलुषित विचार
भीतर से बाहर आने
मारक शब्द बन कर
जब आते हैं वे बाहर
तब लड़खड़ा देते हैं
स्वयं अपनी जुबान को  
लड़ाभिड़ा देते औरों को
भलीभांति वे जानते हैं
कि लड़ंत भिड़ंत होगी
कहां प्रारंभ कहां समाप्त
विकृत विचार सोचते कुछ
दिखावा करते हैं कुछ और

फिर एक दिन
भीतर की समस्त विकृतियां
झलकने लगती है चेहरे पर
वैचारिक कुरूपता छिपाने
सभी जुमलों को पिरो कर
दूसरों को सुनाती बताती है
मिर्च मसालेदार मनगढ़ंत
स्वयं की अनकही कथाएं
प्रशंसा की लत लगने पर
चारों ओर अपने पैर पसारने
प्रसार प्रचार के हथकंडों संग
मरणासन्न सी विकृतियां
शब्दों की चासनी चुपड़ कर
गढ़ने सुनाने बताने लगती है
दूसरों की भी बेबुनियाद झूठी
अनसुनी अनकही कहानियां
ताकि
विकृत हुआ चेहरा सुधर सके
अपनों के अलावा दूसरे भी
गर्व के साथ यह बोल सकें
टेढ़ा है पर हमारा है !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)


 

 


मंगलवार, 28 मार्च 2017

काँटे

काँटा
निकालता है काँटे को
अपनी तीव्र चुभन से
दर्द देते हैं दोनों ही
कँटकित शाखा को
छोड़ देने के बाद भी
चुभना नहीं छोड़ते
और
रास्ते का रोड़ा
बने रहते हैं
काँटे

जमीन
एक न एक दिन
मिला देती है
मिट्टी में काँटे को
चुपचाप कर देती है
जमींदोज़ काँटे को
माटी बना देती है
चुभने वालों को
जमीन !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार) 

सोमवार, 27 मार्च 2017

उस समय

उस समय
वादों के विरूद्ध
भड़केगा आक्रोश
तुष्टि के विरूद्ध असंतुष्टि
अन्याय के विरूद्ध न्याय
असत्य के विरूद्ध सत्य
रेवड़ियों के विरूद्ध हाथ
चरवाहे के विरूद्ध रेवड़
मुआवजे के विरूद्ध मेंड़
बेजा चिमनियों के विरूद्ध
भड़केगी भीतर की आग

दिखाए गए अंगूठे के विरूद्ध
दिखाएगी ताकत उंगलियां
गुस्से से निकलेगा जनादेश
झेले गए समस्त दुख दर्द से
जनतंत्र की संकरी गलियां
होगी साफ सुथरी अच्छे से
उड़ने वालों के पैरों तले
जाएगी खिसक जमीन
वादों की तरह
रुलाएगा जनता का निर्णय
दिखाए गए सपनों की तरह
सुलाएगी काँटों पर सच्चाई
आएगी पीड़ा समझ सबकी
उस समय !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)  



  

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

जीतना किसी भी तरह

जीतना
यह बाजी
सब कुछ दांव पर लगा कर
हर दांवपेंच आजमा कर
सभी मोहरे इस्तेमाल कर
लेकिन
जीतना जरूर
यदि संभव न हो तो भी
जीतना

जीतना
यदि किसी को है हराना
किसी को न हरा सको
तो भी हार न मानना
और
किसी भी तरह
यह बाजी
जीतना

जीतना
इस खेल में
नहीं बहना
खेल भावना में
खिलाड़ी हो पुराने
बखूबी सब जानते हो
अपना भला कैसे हो
प्रतिद्वंदी को हर हाल में
हराना
मंजे खिलाड़ी सिद्ध होने
मजे मौज करने कराने
अपना संकल्प पूरा करने
अपनी जिम्मेदारी बढ़ाने
अपनी जयजयकार कराने
आवश्यक है यह बाजी
जीतना

जीतना
यह बाजी
शतरंजी दिमाग दौड़ा कर
झोंक कर पूरी ताकत
सभी हथकंडे अपना कर
धन बाहु बल का साथ लेकर  
चित्त कर प्यादे घोड़े हाथी
राजा रानी को हरा कर
जीतना
जरूरी नहीं है होना नैतिक
क्योंकि
यह खेल है शुद्ध राजनैतिक
और तो और
इस चुनावी मौसम में
हवा भी है पक्ष में
चहुँ ओर चल रही है लहर
विकास की चालों के कारण
सबका साथ
फिर न मिलेगा कभी इतना
इसलिए भी
आवश्यक है यह बाजी
जीतना
किसी भी तरह !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)
 

बुधवार, 22 मार्च 2017

अपने अपने सपने

ऐसा वे कहते हैं गर्व से
कि
मुक्ति मिली बुरे दिनों से
बीत चुकी है काली रात
हुआ उम्मीदों का सवेरा
अब चैन की नींद लीजिए
क्योंकि
तुम्हें देखने हैं सपने
बहुत सारे
अच्छे भले दिनों के
अगर
कोई कामकाज न हो
तो खुली आंखों से भी
देख सकते हैं दिन में
अच्छी रातों के सपने

तुम्हें देखने हैं दिन रात
छोटे बड़े ढेरों सपने
क्योंकि
वादों की जो घुट्टी तुम्हें
खूब पिलाई गई है वह
नींद की गोलियों से भी
अधिक असरकारक है
पलक झपकते ही तुम्हें
देखने मिलेंगे कई सपने
मुफ्त सैर कराई जाएगी
सपनों के देश प्रदेश में
भूला देंगे भूख प्यास भी
दिखा कर स्वर्ग के सपने

तुम्हें वे होने न देंगे कभी
सहज शांत और स्थिर
अपने वश में वे कर लेंगे
तुम्हारा दिल और दिमाग
संवेदनाएं काबू में न रहेगी
हकीकत जैसे लगेंगे सपने
नियंत्रण से परे होगी मति
तुमने भी तो दी है सहमति
कि देख सको अच्छे सपने
सबके हैं अपने अपने सपने
जैसे चाहोगे वैसे होंगे सपने
वे तो जानते हैं हर तकनीक
सपनों को पंख लगा देने की    

तुम्हें वे कभी नहीं जगाएंगे
क्योंकि
बद से बदतर हुए हालात
देख कर दुखी हो जाओगे
बढ़ती भूख प्यास के मारे
जिंदा लाश बन जाओगे
सद्भावना का रिसता रक्त
इंसानियत के बहते अश्रु
बर्दाश्त नहीं कर पाओगे
घुट घुट कर मर जाओगे
हड्डियों के जीर्ण ढाँचे में
सांसें चलती रहे इसलिए
झूठी हमदर्दी के साथ
तुम कर दिए जाओगे
लंबी गहरी नींद के सुपुर्द !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)
 

   




 

मंगलवार, 21 मार्च 2017

मशाल बनती कविता

आसपास के घटनाक्रम
कुलबुलाहट मय माहौल
कसमसाती अनुभूति
छटपटाती अभिव्यक्ति
अपने भीतर मचे द्वन्द
मन मस्तिष्क के विचार
जब कोरे कागज़ पर
सार्थक सोद्देश्य शब्द बन कर
निकलते हैं किसी कलम से
तब आकार लेती है कविता
यदि कोई करता है उस पर
चिंतन मनन खुले दिमाग से
तो जीवंत हो जाती है कविता

मुर्दों में भी हलचल सी मचा देती    
श्मशान सी खामोशी ख़त्म होती
किन्तु
ज़िंदा लोगों की मुट्ठियों में जब  
कस कर तन जाती यह कविता
तब मशाल बन कर
प्रज्वलित होती है यह कविता !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)  

रविवार, 19 मार्च 2017

राजयोगी

एक हाथ में माला
अपने सिद्ध मनकों से
बटोर रही हैं शक्तियां
दूसरे हाथ में भाला
धारदार नुकीलेपन से
उत्पन्न कर रहा है भय
आस्था के सिर
हिल रहे हैं
पूरी सहमति के साथ
और अनास्था के हाथ
अपना सिर पीट रहे हैं  
असहमति के कारण

आस्तिक हैं आनंदित
नास्तिक हैं भयभीत
सपने दिखा रही है भक्ति
आंखें मूंदे हुए हैं भक्तगण
सपने भंग कर रही अधर्मिता
आंखें दिखा रहे हैं अधर्मीजन 

डर के मारे एकता अखण्डता   
दुबक कर बैठ गई है कोने में
निरंकुश साम्प्रदायिकता 
बौखलाए शब्दों के बाणों से
छलनी कर रही हैं
सद्भावना का सीना
फिर भी
तटस्थ हैं ध्यानस्थ योगी
मौन हैं मुखर प्रखर योगी
क्योंकि
योगी हो गए हैं राजयोगी
राजयोग भोगने के लिए
आवश्यक मानी  
तटस्थता और मौन की युति
चखना भी तो है
अपना स्वर्णिम भविष्य फल

संयोगवश नहीं बना राजयोग
गुरू की अच्छी महादशा वश
केंद्र में युति से बना राजयोग
योगी को बना दिया राजयोगी
ग्रहों की अनुकूल दृष्टि भी रही 
सुधर गई इनकी जन्म कुंडली
विरोधियों को लगी साढ़े साती
सिर से पांव तक तकलीफ देती   
जनता भविष्य के सपने देखती 

सबका साथ पाकर विकसित
महा राजयोगी और राजयोगी
साथ चल पड़े हैं नई डगर पर
साथ मिल कर कर रहे तैयार 
नए मठों के साथ नए भक्त भी    
बुन रहे हैं अब नया तानाबाना
स्व भविष्य कर रहे सुरक्षित !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)