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रविवार, 28 अगस्त 2016

मुफ़लिस ज़िन्दगी

मुफ़लिसी में मौत बन जाती है ये ज़िन्दगी
जीते जी खुद कफ़न बुनती है ये ज़िन्दगी

कुरबतों की दूरी भी हो जाती है लम्बी
हमसफ़र का फ़ासला बढ़ाती है ये ज़िन्दगी

रुसवाई की कील पर टंग जाते हैं रिश्ते
सबके लिए बोझ बन जाती है ये ज़िन्दगी

उधार की सांसें थम जाती है वक़्ते बद
इलाज के बगैर दम तोड़ देती है ये ज़िन्दगी

लाचार मय्यत को चार कंधे भी नहीं मिलते
आंसू बहाते दफ़न हो जाती है ये ज़िन्दगी

बेरहमों की बस्ती में इंसानियत नहीं बसती
अकेले कंधे से अलविदा होती है ये ज़िन्दगी

सियासतदानों के कंधों पर है वादों की गठरी
उम्मीदों में ही घुट कर मर जाती है ये ज़िन्दगी

जुम्हूरियत की ताकत को कमतर न समझो
मौका आने पर सबक सिखाती है ये ज़िन्दगी

मौत के रास्तों का मुसाफ़िर है यहां हर कोई
न जाने किस मोड़ पर ख़फ़ा हो जाये ये ज़िन्दगी

@ दिनेश ठक्कर बापा
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