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रविवार, 28 अगस्त 2016

मुफ़लिस ज़िन्दगी

मुफ़लिसी में मौत बन जाती है ये ज़िन्दगी
जीते जी खुद कफ़न बुनती है ये ज़िन्दगी

कुरबतों की दूरी भी हो जाती है लम्बी
हमसफ़र का फ़ासला बढ़ाती है ये ज़िन्दगी

रुसवाई की कील पर टंग जाते हैं रिश्ते
सबके लिए बोझ बन जाती है ये ज़िन्दगी

उधार की सांसें थम जाती है वक़्ते बद
इलाज के बगैर दम तोड़ देती है ये ज़िन्दगी

लाचार मय्यत को चार कंधे भी नहीं मिलते
आंसू बहाते दफ़न हो जाती है ये ज़िन्दगी

बेरहमों की बस्ती में इंसानियत नहीं बसती
अकेले कंधे से अलविदा होती है ये ज़िन्दगी

सियासतदानों के कंधों पर है वादों की गठरी
उम्मीदों में ही घुट कर मर जाती है ये ज़िन्दगी

जुम्हूरियत की ताकत को कमतर न समझो
मौका आने पर सबक सिखाती है ये ज़िन्दगी

मौत के रास्तों का मुसाफ़िर है यहां हर कोई
न जाने किस मोड़ पर ख़फ़ा हो जाये ये ज़िन्दगी

@ दिनेश ठक्कर बापा

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

कथा वाचक पं. उमेश भाई जानी का बड़प्पन

श्रीमद् भागवत, श्री कृष्ण, श्री जलाराम बापा तथा देवी रांदल माता चरित्र कथा वाचन के अलावा भजनों की संगीतमय मनोहारी प्रस्तुति देने वाले देश प्रसिद्ध पं. उमेश भाई जानी (भिलाई, छत्तीसगढ़ निवासी) का व्यक्तित्व भी प्रेरणादायक हैं। वे मेरी पहली किताब 'जला सो अल्लाह' (संत जलाराम बापा की जीवन कथा) के प्रबुद्ध पाठक और फेसबुक पर आदरणीय मित्र भी हैं। कल उन्होंने फेसबुक इनबॉक्स में आभार संदेश प्रेषित कर मुझे भाव विभोर कर दिया। जो इस प्रकार है- "जय श्री कृष्ण, जय जलाराम, आदरणीय दिनेश भाई आपके द्वारा श्री जलाराम बापा पर लिखी पुस्तक से मुझे काफी जानकारी मिली और श्री जलाराम महिमा कथा करने में मार्गदर्शन मिला। बिलासपुर, इंदौर, दुर्ग, भुवनेश्वर में श्री जलाराम चरित्र कथा सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई। ह्रदय से आभार व धन्यवाद।" वेद पुराण उपनिषद के मर्मज्ञ ज्ञाता-वाचक पं. उमेश भाई जानी का यह सारगर्भित संदेश मेरे लिए अत्यंत उत्साहवर्धक है। उनके इस बड़प्पन और स्नेह को मेरा प्रणाम।