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मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

मर रहा है बेबस बस्तर

आदिकाल से रही है अभिशप्त
खून से सनी बस्तर की मिट्टी
बेमौत मर रहा है बेबस बस्तर
पहले गोरे अब लाल आतंक में
आदिवासियों का बह रहा है लहू
हरीतिमा ओढ़े साल के वनों में
सिर भी कट रहे हैं पेड़ों के साथ
मुखर हुए तो मुखबिरी के शक में
बीच बाजार चढ़ा दिए जाते फांसी
गोरों की तरह लाल साम्राज्य में
बुंदरू सुंदरू जैसे चढ़ाए जाते फांसी
गुण्डाधुर के भूमकाल की आग में
झुलसा अबूझमाड़ भी सुलग रहा
हालांकि अब नहीं बंटती गांवों में
आम की डाल में बंधी लाल मिर्च
सलवा जुड़ुम की भी विफलता में
विस्थापन के साथ मिली है मौत

बस्तर के आदिम समाजशास्त्र में
हावी हो गया दोहन का अर्थशास्त्र
बाधक है समस्या के समाधान में
अपनी अपनी स्वार्थी विचारधारा  
अस्तु आज भी दो पाटों के बीच में
पिस रहा लाचार गरीब आदिवासी
बना दिए गए हैं वे अपने ही क्षेत्र में
प्रत्यक्ष जंग के अप्रत्यक्ष हथियार
अधिकारों की प्रदर्शनी की खूंटी में
टांग दिया गया है नंगधड़ंग शरीर

आतंक के खूनी दंडकारण्य में
झोपड़ियों में कैद हैं तीर धनुष
जल जंगल जमीन की चाह में
शोषण के आदी हो गए हैं वासी
मालिक मकबूजा के प्रकरण में
गुलाम जिंदगी जीने हुए मजबूर
रोटी, कपड़ा, मकान के नारों में
गुम हो गई है भूखे तन की गुहार

दम घुटने लगा है अब घोटुल में
घुट घुट कर जीने वाली पीढ़ी का
मौत की पहरेदारी होती घोटुल में
जीवन साथी चुनना हुआ कठिन
लड़ाए जाते हैं मड़ई हाट बाजारों में
मुर्गों की तरह आपस में आदिवासी
दक्ष किए जाते हैं वे हर दांव पेंच में
पाले पोसे जाते हैं पिला खिला कर  
बांधे जाते हैं छुरे मुर्गों के पैरों में
जबकि इन्हें दी जाती हाथों में बंदूकें
उतारे जाते हैं वे लड़ाई के मैदान में
और मारे जाते है दांव में लगे लड़ाकू
लुगरा लंगोटी बदल रही है कफन में
दफनाने के लिए नसीब नहीं जमीन
इंद्रावती समेत जीवनदायी नदियों में
पानी का रंग भी हो गया है अब लाल

जानलेवा विस्फोटों के बीच
जिंदगी के संग दब गई है अब
मारक गजराजों की चिंघाड़
गोलियों की आवाज के बीच
आक्रांत नहीं करती है अब
जंगल के राजाओं की दहाड़
पहाड़, पेड़, झाड़ियों के बीच  
घात लगा कर टूट पड़ते अब
मानव रक्त के पिपासु भेड़िए
मानवता के परखच्चों के बीच
भक्षकों की भूख बढ़ गई है अब
चील गिद्धों ने डाल दिया है डेरा
आए दिन होती मुठभेड़ के बीच
मृत्यु के दूतों को देख कर अब
भयवश रोते नहीं हैं जंगली कुत्ते  
जलती हुई उग्र मशालों के बीच
रात में मद्धम हो गई है अब
आजाद जुगनुओं की रोशनी
शमशान सी खामोशी के बीच
दहशत से शांत हो गई है अब
निशाचर झींगुरों की ध्वनियां
   
रक्तरंजित इस अरण्य में
मिलना बंद हो गई है अब
इंसानियत को प्राण वायु
हैवानियत की बदबू के बीच
सहम सी गई है सौंधी खुशबू
क्षत विक्षत लाशों के बीच
धूमिल हो गई है अब
पलाश के फूलों की लालिमा
निर्दोषों के बहे खून के कारण    
फीका पड़ गया है अब
सेमल के फूलों का लाल रंग
बारूद की दुर्गन्ध के बीच
मदहोश नहीं करता है अब
टपकता हुआ महुआ फूल
इसे बीनने से मिलती है अब
बारूदी सुरंग में बिछाई मौत
बेटियों का खून बहा देख कर
दहेज में मिला सल्फी का पेड़
नशा नहीं, आंसू बहाता है अब!    

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)





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