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शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

भड़क उठी है स्वार्थ की ज्वाला

बहुत गुस्से में हैं इन दिनों वे
उतार रहे हैं गुस्सा दूसरों पर
पीछे रह जाने का भ्रम हैं उन्हें
रौंद कर आगे बढ़ना चाहते हैं वे
उनके सीने में भड़क उठी है
स्वार्थ की ज्वाला फिर इस बार
व्यवस्था के प्रति आगबबूला हैं वे
स्वार्थ की आग से उबल रहे हैं वे
इसलिए सरे राह लगा रहे हैं आग
सब कुछ राख कर देना चाहते हैं वे
देश जलता रहे, परवाह नहीं है उन्हें
हाथों में हिंसा का झंडा डंडा लेकर
पशुता का प्रदर्शन बेख़ौफ़ कर रहे हैं वे
हैवानियत की सभी सीमा लांघ रहे हैं वे
लोकतंत्र की सड़कों को अवरूद्ध कर
भीड़तंत्र को अपना हथियार बना कर
संपत्ति अस्मत खुले आम लूट रहे हैं वे
अपने जीवन की गाड़ी दौड़ाने खातिर
दूसरों की जिंदगी बेपटरी कर रहे हैं वे
योग्य लोगों की लकीरों को मिटा कर
अपनी लकीर बढ़ाना चाहते हैं वे
पात्र जनों का हक जबरिया छीन कर
खुद अधिकार संपन्न बनना चाहते हैं वे
क्या ये दबंग अग्निपुरुष नहीं जानते
कि स्वार्थ और ईर्ष्या की इस आग से
स्वयं भी झुलस जाएंगे एक दिन वे !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)
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