अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

बाकी है आगे और लड़ाई


चेत जाओ नापाकियों
चेत जाओ आतंकियों
क्योंकि
बहुत गुजर चुका है पानी
अब सिर के ऊपर से
नहीं बह सकता एक साथ
अब खून और पानी
आतंक की अति के अंत का
अब आ गया है समय
धैर्य संयम की नियंत्रण रेखा
अब कर चुके हैं सैनिक पार
गरजने बरसने लगी है मौत
नष्ट होने लगे हैं आतंकी अड्डे
नापाकियों की गीदड़ भभकी
आतंकियों की गतिविधियां
अब टिक नहीं पाएगी
शेर दिल सैनिकों के सामने
आतंक के अपने अभ्यारण्य में
नापाकी आतंकी शिकारी
अब स्वयं हो जायेंगे शिकार
   
चेत जाओ नापाकियों
चेत जाओ आतंकियों
क्योंकि आतंक का तानाबाना
नापाक जमीन पर
बहुत बुना जा चुका है चोरी छिपे
अब कात न सकोगे आतंक के सूत  
उलझ जाओगे अपने ही तानेबाने में
अब हर गांठ करेगी हिसाब चुकता
अपने कच्चे धागों पर न इतराओ
फांसी का फंदा बन गले पड़ जाएगा
यही तानाबाना कफ़न बन जाएगा

चेत जाओ नापाकियों
चेत जाओ आतंकियों
क्योंकि आतंक का चेहरा
तुम्हारी नापाक हरकतों से
अब हो गया है बेनकाब
कूटनीतिक रिश्तों की बर्फ
अब पिघल चुकी है
आपसी संबंध सुधारने के बजाय
समय आया है सबक सिखाने का
गला काटने वालों से गले न मिलेंगे
सैनिक गोली का जवाब गोली से देंगे
अरे नापाकियों
अरे आतंकियों
अभी तो है ये अंगड़ाई
बाकी है आगे और लड़ाई !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)


 

   

रविवार, 28 अगस्त 2016

मुफ़लिस ज़िन्दगी

मुफ़लिसी में मौत बन जाती है ये ज़िन्दगी
जीते जी खुद कफ़न बुनती है ये ज़िन्दगी

कुरबतों की दूरी भी हो जाती है लम्बी
हमसफ़र का फ़ासला बढ़ाती है ये ज़िन्दगी

रुसवाई की कील पर टंग जाते हैं रिश्ते
सबके लिए बोझ बन जाती है ये ज़िन्दगी

उधार की सांसें थम जाती है वक़्ते बद
इलाज के बगैर दम तोड़ देती है ये ज़िन्दगी

लाचार मय्यत को चार कंधे भी नहीं मिलते
आंसू बहाते दफ़न हो जाती है ये ज़िन्दगी

बेरहमों की बस्ती में इंसानियत नहीं बसती
अकेले कंधे से अलविदा होती है ये ज़िन्दगी

सियासतदानों के कंधों पर है वादों की गठरी
उम्मीदों में ही घुट कर मर जाती है ये ज़िन्दगी

जुम्हूरियत की ताकत को कमतर न समझो
मौका आने पर सबक सिखाती है ये ज़िन्दगी

मौत के रास्तों का मुसाफ़िर है यहां हर कोई
न जाने किस मोड़ पर ख़फ़ा हो जाये ये ज़िन्दगी

@ दिनेश ठक्कर बापा

गुरुवार, 25 अगस्त 2016

कथा वाचक पं. उमेश भाई जानी का बड़प्पन

श्रीमद् भागवत, श्री कृष्ण, श्री जलाराम बापा तथा देवी रांदल माता चरित्र कथा वाचन के अलावा भजनों की संगीतमय मनोहारी प्रस्तुति देने वाले देश प्रसिद्ध पं. उमेश भाई जानी (भिलाई, छत्तीसगढ़ निवासी) का व्यक्तित्व भी प्रेरणादायक हैं। वे मेरी पहली किताब 'जला सो अल्लाह' (संत जलाराम बापा की जीवन कथा) के प्रबुद्ध पाठक और फेसबुक पर आदरणीय मित्र भी हैं। कल उन्होंने फेसबुक इनबॉक्स में आभार संदेश प्रेषित कर मुझे भाव विभोर कर दिया। जो इस प्रकार है- "जय श्री कृष्ण, जय जलाराम, आदरणीय दिनेश भाई आपके द्वारा श्री जलाराम बापा पर लिखी पुस्तक से मुझे काफी जानकारी मिली और श्री जलाराम महिमा कथा करने में मार्गदर्शन मिला। बिलासपुर, इंदौर, दुर्ग, भुवनेश्वर में श्री जलाराम चरित्र कथा सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई। ह्रदय से आभार व धन्यवाद।" वेद पुराण उपनिषद के मर्मज्ञ ज्ञाता-वाचक पं. उमेश भाई जानी का यह सारगर्भित संदेश मेरे लिए अत्यंत उत्साहवर्धक है। उनके इस बड़प्पन और स्नेह को मेरा प्रणाम।

शनिवार, 9 अप्रैल 2016

सूखे में गीली हुई आंखें

सूखे की चपेट में है पूरा क्षेत्र
भूख प्यास से त्रस्त
बाशिंदे और परिंदे
कर गए हैं पलायन
अपने अपने रहवास से
शेष रह गए हैं जो अशक्त
उनकी हो रही है अकाल मौत
बुझे हुए चूल्हों के आसपास
नहीं दिख रहे हैं अब
चींटे और चींटियां
चूहे तो पहले ही भाग गए थे
आसन्न संकट को भांप कर
उनके बिलों में रह रहे हैं अब
अलसाए अजगर

पेड़ पौधों के पांव होते
तो वे भी चले जाते
छोड़कर अपनी जड़ों को
किन्तु बंधे हैं वे
प्रकृति के विधि विधान से
उनको देनी है मरते दम तक
सबको जिंदा रखने प्राण वायु
पालतू मवेशी भी जी रहे हैं अब
आवारा जिंदगी
कोई चारा नहीं है उनके पास
सिवाय इधर उधर भटकने के
पसरे हैं मौत की पगडण्डी पर
भूख प्यास से तड़पते मवेशी

खाली हो गए हैं खेत खलिहान
खेत बन गए हैं अब कब्रस्तान
वाद विवाद नहीं होता है अब
मेड़ों के अतिक्रमण को लेकर
कंठ सूख गए हैं प्यास के मारे
भूख मिटाने वाले खेतों के
फट रही है झुलसाती गर्मी में
सूखे खेतों की तनावग्रस्त नसें
बंजर खेतों की गहरी दरारों में
समा गई है भीतर तक
फसल की उम्मीदें
नहीं निकल रहा है कोई हल
सूखे की विकराल समस्या का
बुला रहा है दुख दर्द साझा करने
पशु पक्षियों को भ्रमित करने वाला
रोते खेतों में अकेला पड़ा पुतला

हो गई है वीरान
गांव खेड़े की गलियां और चौपाल
गिन रहा है दिन
अकाल मृत्यु के मुंहाने पर लेटा
बूढ़ी हड्डियों का ढांचा
सूखे में गीली हुई आंखें देख कर
नहीं रोक पा रहा है आंसू
सिराहने बैठा बेबस अशक्त भविष्य
सुन रहा है अतीत से
अकाल की व्यथा गाथा
सिहर उठता है भविष्य
पानी के लिए होने वाले अगले
विश्व युद्ध की भविष्यवाणी सुन कर
फिर पानी मांगते अतीत की खातिर
निकल पड़ता है प्यासा भविष्य भी
बैसाखियों के सहारे पानी की खोज में

सूखे मिलते हैं मीलों तक
नल, हैण्डपम्प, कुंए, तालाब नहर
बंदूकों के साए में लगा है पहरा
सरकारी बांधों के बचे खुचे पानी पर
जल वाहन की घंटों तक प्रतीक्षा में
लड़ भिड़ रही हैं घड़े बाल्टियों की भीड़  
सब कुछ देख कर जान कर भी
आंखें मूंदे बैठा है शासन प्रशासन
नहीं हो रहा है वह शर्म से पानी पानी
सूख चुका है उनकी आंखों का पानी

थक हार कर भविष्य
वापस लौटता है जब अपने गांव
और हो जाता है दुखी  
पंचायत भवन के बाहर मजमा देख कर
ताली बजा रहे हैं पंच सरपंच बड़े बाबू
पानी की तरह पैसा बहाते मैच देख कर
बल्ले बल्ले हो रहे हैं बड़े परदे के सामने
उछल रहे हैं छक्के पर छक्का देख कर
शीतल पेय के विज्ञापन बार बार देख कर
उन्हें हो रहा है आभास
प्यास बड़ी चीज है  
गला तर कर रहे हैं वे ठंडी बोतलें खोल कर  

लाचार भविष्य पानी की बोतल खरीद कर
आता है अतीत के पास
बुझाता है प्यास उसकी तथा अपनी
फिर यह पानी
छलक जाता है दोनों की आंखों से
खून के आंसू बन कर
जल संकट से उपजे हालात सुन कर अतीत
पानी को लेकर होने वाले अगले विश्व युद्ध की
दोहराता है भविष्यवाणी
उखड़ती सांसों के दरम्यान यह कहता है कि  
जल ही जीवन है
जल है तो कल है
और
पथरा जाती हैं
अतीत की आंखें !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

देश राग

गलत नहीं है भारत माता की जय बोलना
गलत है अपनी मां के भी खिलाफ बोलना

देश से बड़ा किसी का भी कद नहीं है ऊंचा
अपना कद छोटा कर कड़वा नहीं बोलना

राज-योग में भले ही लंबी सांसें लेना छोड़ना
लेकिन कानून से ऊपर उठ कर नहीं बोलना

काले मन वाले तन पर सफेद चोला पहन कर
जिंदाबाद मुर्दाबाद के स्वार्थी बोल नहीं बोलना

हिंसक टोपी पहन कर दूसरों को नहीं भड़काना
देश में ही रह कर अलगाव के बोल नहीं बोलना

देश की एकता अखण्डता को सदा कायम रखना
आपसी भाईचारे को बढ़ाने के लिए मीठा बोलना

जिस थाली में खाते हो उसमें कभी छेद नहीं करना
भूखों का पेट भरता रहे वैसे राष्ट्रवादी बोल बोलना

राष्ट्र का सम्मान घटा कर देशभक्ति नहीं दिखाना
दबे कुचले पिछड़ों का मान बढ़ाने खुल कर बोलना

देशभक्ति का प्रमाण पत्र लेने देने की होड़ नहीं मचाना
देश में अमन चैन बना रहे वैसे मानवीय बोल बोलना

अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग होगा छोड़ना
राष्ट्र के हित में होगा देश राग में गाना बजाना बोलना !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

मर रहा है बेबस बस्तर

आदिकाल से रही है अभिशप्त
खून से सनी बस्तर की मिट्टी
बेमौत मर रहा है बेबस बस्तर
पहले गोरे अब लाल आतंक में
आदिवासियों का बह रहा है लहू
हरीतिमा ओढ़े साल के वनों में
सिर भी कट रहे हैं पेड़ों के साथ
मुखर हुए तो मुखबिरी के शक में
बीच बाजार चढ़ा दिए जाते फांसी
गोरों की तरह लाल साम्राज्य में
बुंदरू सुंदरू जैसे चढ़ाए जाते फांसी
गुण्डाधुर के भूमकाल की आग में
झुलसा अबूझमाड़ भी सुलग रहा
हालांकि अब नहीं बंटती गांवों में
आम की डाल में बंधी लाल मिर्च
सलवा जुड़ुम की भी विफलता में
विस्थापन के साथ मिली है मौत

बस्तर के आदिम समाजशास्त्र में
हावी हो गया दोहन का अर्थशास्त्र
बाधक है समस्या के समाधान में
अपनी अपनी स्वार्थी विचारधारा  
अस्तु आज भी दो पाटों के बीच में
पिस रहा लाचार गरीब आदिवासी
बना दिए गए हैं वे अपने ही क्षेत्र में
प्रत्यक्ष जंग के अप्रत्यक्ष हथियार
अधिकारों की प्रदर्शनी की खूंटी में
टांग दिया गया है नंगधड़ंग शरीर

आतंक के खूनी दंडकारण्य में
झोपड़ियों में कैद हैं तीर धनुष
जल जंगल जमीन की चाह में
शोषण के आदी हो गए हैं वासी
मालिक मकबूजा के प्रकरण में
गुलाम जिंदगी जीने हुए मजबूर
रोटी, कपड़ा, मकान के नारों में
गुम हो गई है भूखे तन की गुहार

दम घुटने लगा है अब घोटुल में
घुट घुट कर जीने वाली पीढ़ी का
मौत की पहरेदारी होती घोटुल में
जीवन साथी चुनना हुआ कठिन
लड़ाए जाते हैं मड़ई हाट बाजारों में
मुर्गों की तरह आपस में आदिवासी
दक्ष किए जाते हैं वे हर दांव पेंच में
पाले पोसे जाते हैं पिला खिला कर  
बांधे जाते हैं छुरे मुर्गों के पैरों में
जबकि इन्हें दी जाती हाथों में बंदूकें
उतारे जाते हैं वे लड़ाई के मैदान में
और मारे जाते है दांव में लगे लड़ाकू
लुगरा लंगोटी बदल रही है कफन में
दफनाने के लिए नसीब नहीं जमीन
इंद्रावती समेत जीवनदायी नदियों में
पानी का रंग भी हो गया है अब लाल

जानलेवा विस्फोटों के बीच
जिंदगी के संग दब गई है अब
मारक गजराजों की चिंघाड़
गोलियों की आवाज के बीच
आक्रांत नहीं करती है अब
जंगल के राजाओं की दहाड़
पहाड़, पेड़, झाड़ियों के बीच  
घात लगा कर टूट पड़ते अब
मानव रक्त के पिपासु भेड़िए
मानवता के परखच्चों के बीच
भक्षकों की भूख बढ़ गई है अब
चील गिद्धों ने डाल दिया है डेरा
आए दिन होती मुठभेड़ के बीच
मृत्यु के दूतों को देख कर अब
भयवश रोते नहीं हैं जंगली कुत्ते  
जलती हुई उग्र मशालों के बीच
रात में मद्धम हो गई है अब
आजाद जुगनुओं की रोशनी
शमशान सी खामोशी के बीच
दहशत से शांत हो गई है अब
निशाचर झींगुरों की ध्वनियां
   
रक्तरंजित इस अरण्य में
मिलना बंद हो गई है अब
इंसानियत को प्राण वायु
हैवानियत की बदबू के बीच
सहम सी गई है सौंधी खुशबू
क्षत विक्षत लाशों के बीच
धूमिल हो गई है अब
पलाश के फूलों की लालिमा
निर्दोषों के बहे खून के कारण    
फीका पड़ गया है अब
सेमल के फूलों का लाल रंग
बारूद की दुर्गन्ध के बीच
मदहोश नहीं करता है अब
टपकता हुआ महुआ फूल
इसे बीनने से मिलती है अब
बारूदी सुरंग में बिछाई मौत
बेटियों का खून बहा देख कर
दहेज में मिला सल्फी का पेड़
नशा नहीं, आंसू बहाता है अब!    

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)





रविवार, 3 अप्रैल 2016

खून से सने हुए हाथ

उनकी नसों
उनकी अस्थियों
उनकी सोच में बागी हो चुका है खून
उनके सिर पर सवार है खून
जंगल लाल कर रहे हैं बहा कर खून
हालात जाकर देखोगे समझोगे
तो पूरी दास्तां बयां कर देंगे
उनके खून से सने हुए हाथ

उनको विश्वास नहीं है
अहिंसा के आदर्शों पर
उनको भरोसा नहीं है
सरकार के सिद्धांतों पर
उनको विश्वास नहीं है
नीयत और नीतियों पर
उनको केवल भरोसा है
अपने खूनी आतंक पर
उनको सिर्फ विश्वास है
समानांतर सरकार पर
उनको काबिज रहना है
अकूत वन संपदाओं पर
उनको हुकूमत करना है
निरीह आदिवासियों पर  

लेकिन
हमारा अटूट विश्वास है
मददगार मानवता पर
हमारा पुख्ता भरोसा है
जीवनदायी प्रयासों पर
हमारा संपूर्ण विश्वास है
सर्व प्रगति की पहल पर
बेहतर नतीजे हासिल होंगे  
जब तक हम दिखाते रहेंगे
सरकार को भी आइना !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)
 


 


मंगलवार, 29 मार्च 2016

पतझड़ में झड़ते हुए पत्ते

झड़ रहे हैं सूखे पत्ते
बारी बारी
इस पेड़ के
उस पेड़ के
शाखाओं से बिछड़ कर
जड़ों में समा रहे हैं झड़े पत्ते

पतझड़ के इस निष्ठुर मौसम में
मैं सुन रहा हूं सूखे पत्तों का रूदन
मैं सुन रहा हूं गर्म हवा की हंसी
वह इन दिनों उखाड़ रही हैं सांसें
कब्र सजा रही है गिराए पत्तों की
अश्रुपूरित हैं आंखें
इस पेड़ की
उस पेड़ की
और
गा रहे हैं वे रोते हुए जुदाई का गीत

उग रहे हैं अब नए सिरे से नए पत्ते
बारी बारी  
इस पेड़ पर
उस पेड़ पर
सज्जित, हर्षित हो रही हैं शाखाएं
छा रही है हरियाली
पेड़ों के सिर से लेकर पांव तक
फल फूल रहा है
जड़ों का आशीर्वाद

मैं सुन रहा हूं
बरसने वाले बादलों का वादन    
मैं सुन रहा हूं
बारिश में भीगी हवा का गायन
राग वर्षा में आबद्ध
सुरीले सुर ताल से
झूम उठे हैं हरिया कर
हर पत्ते
इस पेड़ के
उस पेड़ के
और
गा रहे हैं वे झूमते हुए खुशी के गीत

जवां हो रहे हैं नए पत्ते
हौले हौले
आ रहा है बुढ़ापा
इस पेड़ पर
उस पेड़ पर
आ रही है झुर्रियां
तने हुए तनों पर
सूख रही हैं शाखाएं
अब पत्तों के साथ

उधर
गर्म हवा  
और
तेज धूप
गरम कर रही है उनका लोहा
वार के लिए तैयार है कुल्हाड़ी
इस पेड़ को
उस पेड़ को
काट दिया जाएगा प्रहार से
अलग कर दिया जाएगा    
उनको उनकी ही जड़ों से
बारी बारी !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

           
 
 


 

           
 
 


सोमवार, 28 मार्च 2016

आहत भावनाएं

इस संवेदनशील समय में
दुखी हैं गुरुघंटाल
क्योंकि
कुछ दिनों से
हो गए हैं मजाकिए गंभीर
हो गए है वे सचेत
अपने से बड़े मसखरों के प्रति
नकल में अकल लगाना
अब सुहाता नहीं है उन्हें
खतरे से खाली नहीं है यह
हास्य व्यंग्य को रोते देखना
समझदारी लगती नहीं उन्हें

मजाकियों की सजगता से
आहत हुई है भावनाएं
गुरूघंटालों की
हो गई है उन्हें असहनीय
मजाकियों की सहनशीलता
इसमें भी लग रही है साज़िश
प्रबल विरोधियों की उन्हें

उधर
सब देख-सह रहा है ऊपर वाला
लीलाबाज गुरूघटालों को
सशंकित है वह
कहीं उस पर भी न लग जाय
असहिष्णु होने का आरोप
इसीलिए
भौंडी नकल उतारने वाले गुरुघंटाल
खुद बन गए हैं बहुत बड़े कलाकार
बाहुबली हो गए हैं स्वयंभू अवतार
कुर्सी पर बैठाने हो गए हैं मददगार !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)


नया साल, पुराने जख़्म

नया साल
आता है
हर बार
फिर
बीत जाता है
यूं ही
छीन लेता है
पुरानी तारीखें
और
दे जाता है
नई तारीखें
भूख मिटाने के लिए

नया साल
आते ही
धनी छतों पर
रोशनी बढ़ जाती है
पिछली तारीखें भी
यहां जश्न मनाती हैं
नया कैलेण्डर भी
पुराने कैलेण्डर संग
हमप्याला हो जाता है
और
नई तारीखें
सिखा देती हैं
शोषण के नए तरीके

नया साल
आते ही
हमेशा की तरह
निर्धन छतों पर
अंधेरा गहरा जाता है
पिछली तारीखों के
पुराने जख्मों पर
नई तारीखें
नमक छिड़क देती है
पुराने कैलेण्डर की मानिंद
नया कैलेण्डर भी
भूख प्यास की मियाद
और बढ़ा देता है
बेबस आंखों में
बेरहम समय
छलकते रहता है
आंसू बन कर
साल भर !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

गुरुवार, 10 मार्च 2016

वतन की खातिर बोल सको तो बोलो

गुस्से से लाल हैं वतन के दुश्मन
दहशतगर्द आकाओं की मौत पर
जिंदा हैं अब भी उनकी हैवानियत
इसे बेख़ौफ़ मिटा सको तो बोलो

मुल्क का बहुत गरम है माहौल
बगावती जुबां उगल रही है आग
झुलस रहा है अवाम का अमन चैन
इस आग को बुझा सको तो बोलो

सच बोलने से तकलीफ तो होगी
इसके बावजूद बोल सको तो बोलो
वे लोग आमादा हैं जुबां काटने पर
अपना मुंह खोल सकते हो तो बोलो

दुश्मनों के कई हैं कच्चे झूठे चिट्ठे
इसे सच्चाई से खोल सको तो बोलो
उनके चाहने से बदलेगी नहीं हकीकत
भीतरी आवाज सुन सकते हो तो बोलो

यहां हैं जितने गुस्से से हुए लाल मुंह
उतनी हो रही हैं इन दिनों दोगली बातें
सच्चाई बयां करता मेरा मुंह बंद करा कर
सिर उठा कर सच बोल सकते हो तो बोलो

चौतरफा मचा हुआ है यहां कुतर्कों का शोर
गद्दारों की इस भीड़ में खुद को बुलंद कर
तर्कों के साथ आवाज उठा सको तो बोलो
दुश्मनों को मुंहतोड़ जवाब दे सको तो बोलो

खरीद फ़रोख्त के इस सियासी बाजार में
हर कोई चाहता बोलना फायदे मुताबिक़
नफा नुकसान की सोच से ऊपर उठ कर
वतन की खातिर बोल सकते हो तो बोलो !

@ दिनेश ठक्कर बापा  
(चित्र गूगल से साभार)




 
 
 


सोमवार, 7 मार्च 2016

आस्तीन के सांप

आतंकियों को आदर्श मानने वाले
उनकी मौत का मातम मनाने वाले
आस्तीन के सांप
देश की एकता अखंडता को डंसते
अलगाव का जहर लगातार उगलते
महसूस करने लगे हैं
कि वे हो गए हैं महा विषधर
बढ़ गई है उनकी महत्वाकांक्षा
अब वे चाहते हैं पूजित होना
आकाओं के गले का हार बन कर
चाहते हैं अमृत पीना
जन आस्था से लिपट कर
लेकिन यह उनका मुगालता है
सच तो यह है
कि जब वे
सियासी सपेरों के कब्जे में होंगे
तब निर्ममता से तोड़ दिए जाएंगे
उनके विष के दांत
गुलामी के पिटारे में वे कैद हो जाएंगे
जन प्रदर्शन के जीव बना दिए जाएंगे
तब वे केवल
स्वार्थ की बीन के आगे
फन उठा कर
फूंफकार कर
अपना सर्प धर्म निभाएंगे
और
आकाओं की भूख मिटाएंगे !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

शनिवार, 5 मार्च 2016

तवा गरम है सेंक लो रोटी


कुर्सी के भूखे आपस में जुट गए
स्वार्थ का चूल्हा जलाने के लिए
गिले शिकवे भूल गले मिल गए  
दुश्मनी छोड़ कर हाथ मिला लिए
आग लगाने हथकंडे अपना लिए
देशद्रोह की कुल्हाड़ी हाथों में लिए      
भविष्य का हरा पेड़ काटने लग गए
आजादी का चमन उजाड़ने लग गए
बली बनाने लगे बकरा बलि के लिए
आग लगाई तवा गरम करने के लिए

बदली में लाल सूरज की राह देखने लगे
धुंध में भी धूप की उम्मीद करने लगे  
काली घटाओं से सूरज जब बाहर आया
परछाई में कद लम्बा देख भ्रम हो गया
खुद को खलनायक से नायक बना पाया
तिरंगा लेकर देशभक्ति का नारा लगाया
बोलवचनों से आम आदमी को भरमाया
सियासी जमीं में नियोजित कदम बढ़ाया
चुनावी फसल काटने हेतु हंसिया उठाया
कुर्सी की भूख मिटाने ईंधन अन्न जुटाया

स्वार्थ के चूल्हे में अब भड़क उठी है आग
चूल्हे के लिए जुबां भी उगलने लगी आग
तवा गरम है सेंक लो रोटी
बलि के बकरे की खा लो बोटी बोटी
कुर्सी की भूख मिटा लो तोंद है मोटी
लोकतंत्र की तंग गलियां हैं बहुत छोटी
ज्यादा नहीं चल पाओगे तुम चालें खोटी
हिसाब चुकता करेगी मेरे देश की माटी !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)



 



 





 



 

 

शुक्रवार, 4 मार्च 2016

"रावण" की मौत

बचपन से ही बड़ा बनना चाहता था वह
सब कुछ पढ़ा, बन गया ज्यादा होशियार
चालाक होने के बावजूद भोले का भक्त था
बड़ा हुआ तो घुटा राजनीतिज्ञ बन गया वह
सभी दांवपेंच सीख कर सिंहासन पर जा बैठा
समयानुसार दसों मुंह से बोल कर छलने लगा
अपने खास दसों सिरों से बाहुबली बन गया
सिंहासन का जादू सिर चढ़ कर बोलने लगा
सत्ता का अहंकार दसों सिर पर हावी हो गया
बीसों हाथों से शक्ति का दुरूपयोग करने लगा
मायावी प्रपंचों से उसका अत्याचार बढ़ता गया
समस्त लक्ष्मण रेखाएं निर्भयता से लांघने लगा
स्व हित साधने सामाजिक मर्यादा भूलता गया
पराया धन कब्जे में कर आकाश में उड़ने लगा
दूसरों की लक्ष्मी अपनी वाटिका में लाते गया
राज महल से विभीषण बाहर निकलने लगा
सोने वाला भी जाग गया
एक दिन
उसकी सोने की लंका जल गई
और वह
"रावण" की मौत मारा गया !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

गुरुवार, 3 मार्च 2016

मध्यम वर्ग की दुर्दशा

सत्ताधारियों की बदनीयत से
मध्यम वर्ग की नियति है 
त्रिशंकु बने रहने की
अर्थ रक्त पिपासु टोपीबाजों का
आसान शिकार बन गया है
अशक्त निहत्था मध्यम वर्ग
टैक्स महंगाई का बोझ ढोते ढोते
टूट गई है कमर उसकी
अब वह न घर का रहा न घाट का

सत्ता के भूखे सेंक लेते हैं अपनी रोटी
उसके गरम तवे पर
बैठते ही कुर्सी पर
निर्ममता से फेर देते हैं पानी
उसके चूल्हे और उम्मीदों पर
चला देते हैं सरकारी कैंची
उसकी जुबाँ और जेब पर
विकास के नाम पर करने भरपाई
भ्रामक जुमलों से देकर दुहाई
छीन ली जाती जोड़ी हुई पाई पाई
फिर गृहस्थी की दरकी दीवार पर
कील में टँगी रह जाती है
राहत और सुख चैन की अपेक्षाएं

मध्यम वर्ग पर मार चौतरफा है
महंगाई का दुरूह मार्ग पार करने
अर्थव्यवस्था के अंधे खूनी मोड़ पर
छोड़ दिया जाता उसे बेबस अकेला
प्रावधानों और कटौती के अवरोधक
धीमी कर देते हैं गति जीवन यात्रा की
यदि वह गंतव्य तक पहुँच गया
तो अपनी पीठ थपथपा लेते हैं सत्ताधारी
अन्यथा उसके सिर फोड़ देते हैं ठीकरा

मध्यम वर्ग की दुर्दशा है
कि उसकी सुनने वाला कोई नहीं
सियासी दांवपेंच में फंस गया है वह
सत्ताधारियों से निरंतर होती उपेक्षाओं से
लोकतंत्र के हाशिए में चला गया है वह
कड़वे अनुभव से हो रही है समाप्त
उसके गृहस्थ जीवन की मिठास

मध्यम वर्ग की विसंगति है
कि उसका बुढ़ापा आने पर
लग गई है नजर शातिर गिद्धों की
उसके भविष्य की निधि पर
उसके ताउम्र बचत के निवाले पर
तैयारी है झुण्ड में झपट कर नोंच खाने की
फिर यही गिद्ध आम चुनाव के वक्त
शांति के कबूतर बन कर
चुगेंगे दाना उसकी मंझोली मुँडेर पर
पेट भर जाने पर
बहुमत मिल जाने पर
उड़ जाएंगे ये कुनबे के साथ
और
आशियाना बना लेंगे
ऊँची आलीशान मुंडेर पर !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

सोमवार, 29 फ़रवरी 2016

आम आदमी और बजट

विपक्ष में थे जब वे
बजट खराब लगता था
आम आदमी के लिए
बजट नकारा लगता था
बनाने लगे अब बजट वे
विपक्ष खराब लगता है
और बजट के लिए
आम आदमी नकारा लगता है

सत्ता पर जब आँखें गड़ी थी
आम आदमी तब उनके लिए
आँखों का तारा लगने लगा
सत्ता में आते ही आम आदमी
आँखों को काँटे सा चुभने लगा
खास आदमी
आँखों को फूल सा सुहाने लगा
बजट बनने लगा
खास आदमी के फायदे के लिए
आम आदमी घाटे में रहने लगा
बजट पेश करने से पहले ही वे
मिल बाँट कर खा लेते हैं हलवा
और बजट की कड़वाहट
छोड़ जाते हैं आम आदमी के लिए

बजट को विकासपरक बता कर वे
आम आदमी को सपने दिखाते हैं
खास आदमी के सपने साकार करते हैं
आम आदमी के हिस्से की धूप वे
खास आदमी के सुपुर्द कर देते है
अच्छे दिन केवल अपने लिए लाते है वे
और बजट प्रावधानों के बोझ तले
जीते जी मरता रहता है आम आदमी

सत्ता हाथ से निकलते देख कर वे
बजट बनाते हैं आम आदमी के लिए
अगला आम चुनाव सम्पन्न होने तक
आँखों का तारा फिर से बन जाता है
आम आदमी !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

शनिवार, 27 फ़रवरी 2016

भड़क उठी है स्वार्थ की ज्वाला

बहुत गुस्से में हैं इन दिनों वे
उतार रहे हैं गुस्सा दूसरों पर
पीछे रह जाने का भ्रम हैं उन्हें
रौंद कर आगे बढ़ना चाहते हैं वे
उनके सीने में भड़क उठी है
स्वार्थ की ज्वाला फिर इस बार
व्यवस्था के प्रति आगबबूला हैं वे
स्वार्थ की आग से उबल रहे हैं वे
इसलिए सरे राह लगा रहे हैं आग
सब कुछ राख कर देना चाहते हैं वे
देश जलता रहे, परवाह नहीं है उन्हें
हाथों में हिंसा का झंडा डंडा लेकर
पशुता का प्रदर्शन बेख़ौफ़ कर रहे हैं वे
हैवानियत की सभी सीमा लांघ रहे हैं वे
लोकतंत्र की सड़कों को अवरूद्ध कर
भीड़तंत्र को अपना हथियार बना कर
संपत्ति अस्मत खुले आम लूट रहे हैं वे
अपने जीवन की गाड़ी दौड़ाने खातिर
दूसरों की जिंदगी बेपटरी कर रहे हैं वे
योग्य लोगों की लकीरों को मिटा कर
अपनी लकीर बढ़ाना चाहते हैं वे
पात्र जनों का हक जबरिया छीन कर
खुद अधिकार संपन्न बनना चाहते हैं वे
क्या ये दबंग अग्निपुरुष नहीं जानते
कि स्वार्थ और ईर्ष्या की इस आग से
स्वयं भी झुलस जाएंगे एक दिन वे !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

अब तो हल्ला बोल

तुम अन्याय के खिलाफ
खड़े होते क्यों नहीं
हल्ला बोलते क्यों नहीं
भुखमरी, शोषण के विरुद्ध
आवाज उठाते क्यों नहीं
आखिर कब तक दुबके रहोगे
आँखें कब खुलेंगी सोए जमीर की ?

कड़वा सच है यह
सब देख, सुन, जान, सह कर भी
मौन रहने वाला
होता है मुर्दे की मानिंद
इसलिए समय रहते
जमीर के साथ स्वयं को भी जगाओ
अपने अधिकार, कर्तव्य को समझो
आवाज दबाने वालों से सतर्क रहो
उनका मुखौटा उतारना होगा
हल्ला बोलने और हल्ला मचाने वालों में
अंतर समझना होगा
पहचान जरूरी है अपने और परायों की
वक्त का तकाजा है इस विषम स्थितिं में
अब तो हल्ला बोल !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

गुरुवार, 25 फ़रवरी 2016

हम चुप क्यों हैं

हम चुप क्यों हैं
किस भय से सहमे हुए हैं हम
सम्पूर्ण ज्ञानार्जन, समझदारी
सत्यवादी और राष्ट्रवादी होते हुए भी ?

हम चुप क्यों हैं
मात्र इस आशंकावश
कि कहीं मुखर हुए
और सच बोले तो
आधे अधूरे ज्ञानी, राष्ट्रद्रोही, उग्रवादी
सदा के लिए कहीं चुप न करा दें हमें !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)