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मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

कन्याकुमारी स्थित संत कवि तिरुवल्लुवर स्मारक

कन्याकुमारी में हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के संगम स्थल में एक चट्टान पर निर्मित संत कवि तिरुवलुवर स्मारक उनके श्रेष्ठतम प्राचीन तमिल साहित्य सृजन को समर्पित है। तिरुवल्लुवर तमिल साहित्य में विशिष्ट और श्रद्धापूर्ण स्थान प्राप्त प्राचीन महाकाव्य ग्रन्थ "तिरुक्कुरल" के रचयिता थे। तमिल भाषा में लिखित यह मुक्तक काव्य ग्रन्थ नीतिशास्त्र पर आधारित है। इसकी रचना का काल ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर छठवीं शताब्दी के मध्य माना जाता है। हालांकि इनके अस्तित्व और कृतित्व  के कालखंड का अनुमान पुरातात्विक साक्ष्यों के बजाय भाषायी साक्ष्यों के आधार पर लगाया गया है। नैतिकता का विशेष बोध कराने वाला "तिरुक्कुरल" तीन खण्डों, अरम (आचरण-सदाचार), परूल (सांसारिकता-संवृद्धि) और इंबम (प्रेम-आनद) में विभाजित है। धर्म, अर्थ और काम काण्ड में विभक्त इस कृति के कुल 133 अधियाकरम (अध्याय) है। प्रत्येक अध्याय में दस कुरल (दोहे) हैं। तिरुवल्लुवर ने अपनी इस कृति के धर्म काण्ड में अध्यात्म, भक्ति, गृहस्थ जीवन, व्यक्तिगत सदाचार विचार व्यवहार पर ख़ास जोर दिया है। अर्थ काण्ड में जन कल्याणकारी राज धर्म, राजनीतिक कर्म, आदर्श शासक के कर्तव्य दायित्व, राज्य की बेहतर  अर्थव्यवस्था आदि पर बल दिया है। काम काण्ड में पुरूष महिला के बीच आदर्श समर्पित प्रेम संबधों की व्याख्या भी की गई है। उन्होंने इसके जरिए लोगों को यह सन्देश भी दिया है कि पवित्र आध्यात्मिक दिव्य जीवन जीने की खातिर अपने परिवार का त्याग कर सन्यासी बनने की जरूरत नहीं है। गृहस्थ रह कर भी ऐसा इच्छित जीवन जी सकते हैं। बताया जाता है कि गीता के बाद तिरुक्कुरल का देश विदेश की सर्वाधिक भाषाओ में अनुवाद हो चुका है।
 इतिहासकारों का कहना है कि तिरुवल्लुवर का जन्म मायलापुर (वर्तमान चेन्नई का एक हिस्सा) में हुआ था। सात भाई बहनों में वे सबसे छोटे थे। इनके माता पिता ने संतानों को त्याग दिया था। एक दंपती ने तिरुवल्लुवर को पाला पोसा था। जुलाहा कार्य और वैचारिक रूप से समानता की वजह से तिरुवल्लुवर को तमिल साहित्य का कबीर भी माना जाता है। पत्नी वासुकि उनके प्रति अत्यंत समर्पित थी। तिरुवल्लुवर को थेवा पुलवर, वल्लुवर, पोयामोड़ी पुलवर जैसे नामों से भी जाना जाता है। इनके जीवन का अधिकाँश समय मदुरै में व्यतीत हुआ था। तमिल साहित्य को बढ़ावा देने वाले पांड्य शासक के दरबार में ही इनकी कृति तिरुक्कुरल को श्रेष्ठ ग्रन्थ बतौर मान्यता दी गई थी। तिरुवल्लुवर के धर्म-जाति संबंध को लेकर विद्वानों में मत विभिन्नता है। शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन मतावलंबियों के जुड़ाव संबंधी विरोधाभासी तर्क है। कुछ का मानना है कि वे जैन मुनि थे, क्योंकि तिरुक्कुरल का प्रथम अध्याय जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव को समर्पित है। साथ ही इस कृति के कई शिक्षा-सन्देश भी जैन धर्म की शिक्षाओं से मिलते जुलते हैं। कुछ शोधकर्ताओं ने उन्हें तमिल परम्परा में परैयार के रूप में निरूपित किया है। जबकि कन्याकुमारी ऐतिहासिक सांस्कृतिक शोध केंद्र का दावा है कि तिरुवल्लुवर राजा थे। उन्होंने पहाड़ी क्षेत्र वल्लुवनाडु पर शासन किया था।
बहरहाल, तमिलनाडु राज्य सहित पूरे दक्षिण भारत में श्रद्धेय संत कवि बतौर इनके प्रति आस्था और सम्मान प्रकट किया जाता है। इसी परिप्रेक्ष्य में कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक के निकट तिरुवल्लुवर की 133 फुट ऊंची प्रतिमा भी स्थापित की गई है। इनकी कृति तिरुक्कुरल के अध्यायों की कुल संख्या भी 133 है। हालांकि प्रतिमा की वास्तविक ऊंचाई मात्र 95 फुट है जो 38 फुट ऊँचे शिला मंच पर खड़ी है। तिरुक्कुरल के धर्म संबंधी अध्याय भी 38 हैं। इसके अलावा तिरुवल्लुवर की तीन अंगुलियां इनकी कृति के तीन खंड अरम, परूल और इंबम का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस स्मारक की आधारशिला वर्ष 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा रखी गई थी, लेकिन निर्माण कार्य किन्हीं कारणों से शुरू न हो सका। फिर सात सितम्बर, 1990 को निर्माण कार्य शुरू हुआ, जो 1999 में पूर्ण हुआ। एक जनवरी 2000 को तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. मु. करूणानिधि  ने इस स्मारक को लोकार्पित किया था। पत्थर और कांक्रीट से निर्मित इस स्मारक के डिजाइनर डा. वी. गणपति स्थापति हैं। यह स्मारक भी पर्यटकों और साहित्य प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। सूर्यास्त के बाद यहां की रंगबिरंगी रोशनी से स्मारक का आकर्षण बढ़ जाता है।
@ दिनेश ठक्कर बापा
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