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शनिवार, 28 नवंबर 2015

कन्याकुमारी स्थित स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक

कन्याकुमारी के तट से करीब पांच सौ मीटर दूर समुद्र के बीच दो विशाल चट्टानों में से एक पर निर्मित स्वामी विवेकानंद स्मारक का स्थापत्य शिल्प आकर्षक है। कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद देश का प्रचार करने विदेश प्रस्थान से पूर्व वर्ष 1892 में कन्याकुमारी पधारे थे। इसी चट्टान पर उन्होंने तीन दिनों तक ध्यान साधना की थी। जिसके बाद उन्होंने "मानव सेवा ही माधव सेवा" सहित कई कल्याणपरक सन्देश दिए थे।
वर्ष 1963-64 में पूरे देश में स्वामी विवेकानंद जन्म शताब्दी वर्ष मनाया गया था। इस मौके पर गठित विवेकानंद शिला स्मारक समिति ने इसी ऐतिहासिक चट्टान पर स्मृति सम्मान बतौर स्मारक बनाने की योजना बनाई थी, जो वर्ष 1970 में साकार हुई थी। स्मारक निर्मित होने के पश्चात मानव सेवा के सन्देश को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करने के निमित्त विवेकानंद केंद्र की स्थापना भी हुई थी।
जानकारों का कहना है कि इसी चट्टान पर प्राचीनकाल में देवी का मूल मंदिर था, जो कालान्तर में तट के निकट स्थानांतरित कर दिया गया था। यह भी मान्यता प्रचलित है कि इसी चट्टान पर देवी कन्याकुमारी ने भी तपस्या की थी। इस चट्टान पर प्राकृतिक रूप से बने चरण चिन्ह को श्रद्धालु देवी के चरण चिन्ह बतौर पूजते हैं। इसीलिये यह चट्टान "श्रीपाद पारै" (चट्टान) के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस चट्टान पर ही श्रीपाद मंडपम, विवेकानंद मंडपम और ध्यान मंडपम बने हैं। धातु निर्मित स्वामी विवेकानंद की आदमकद प्रतिमा बेहद आकर्षक है।
स्मारक परिसर में स्वामी विवेकानंद साहित्य प्रदर्शन विक्रय केंद्र भी स्थापित किया गया है। यह स्मारक स्थल कन्याकुमारी आने वाले पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। कन्याकुमारी के तट से यहां तक आने जाने बोट का सफ़र भी रोमांचकारी रहता है। शाम के बाद इस स्मारक स्थल की रंग बिरंगी प्रकाश सजावट मन मोह लेती है।
@ दिनेश ठक्कर बापा
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