अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

समंदर पर लहरों की उछलकूद


उछलकूद मचा रही हैं लहरें
सूर्योदय के समय समंदर पर
सर्द हवा के झोंके
टकरा रहे हैं आँखों में
नम कर रही हैं नज़रों को
किनारों से मिलने बेताब लहरें
यदि पलकें खोलें
तो भिगो देती हैं
समंदर की बेसब्र सी बूँदें
मुझे चैन से रहने दो
अपने पथरीले किनारों पर
सपने देखती आँखों पर
जागृत सूर्य किरणें रख दो
उछलकूद मचाती यह लहरें
मुझे कहीं असहिष्णु न कर दे !
@ दिनेश ठक्कर बापा
एक टिप्पणी भेजें