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गुरुवार, 19 नवंबर 2015

रामेश्वरम द्वीप का धनुषकोडी तीर्थ


रामेश्वरम द्वीप के दक्षिण दिशा की तरफ स्थित धनुषकोडी समुद्र तट पौराणिक मान्यता की दृष्टि से श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है। एक मान्यता यह है कि श्रीराम ने अपने धनुष के एक छोर से इस स्थल को सेतु निर्माण के लिए चिन्हांकित किया था। दूसरी मान्यता हैं कि विभीषण के निवेदन पर श्रीराम ने अपने धनुष के एक सिरे से सेतु को तोड़ दिया था। इन्ही मान्यताओं के कारण इसका नाम धनुषकोडी पड़ा। श्रद्धालुओं में यह मान्यता भी है कि चारों धाम की यात्रा का समापन धनुष कोडी में स्नान पूजा अर्चना के बाद होता है। यह बंगाल की खाड़ी (महोदधि) और हिंद महासागर (रत्नाकर) का संगम स्थल भी होने के कारण इसकी पवित्रता अधिक मानी जाती है। यहां अस्थि विसर्जन और पितृ तर्पण भी किये जाने की प्रथा है। यहां से श्रीलंका 27 किमी दूर है। 22 दिसंबर 1964 की रात को श्रीलंका के वावुनिया को पार करते हुए भीषण समुद्री तूफ़ान ने धनुषकोडी रेलवे स्टेशन और गांव को अपनी चपेट में ले लिया था। पम्बन धनुषकोडी पैसेंजर ट्रेन समुद्र में समा गई थी। इस हादसे में सभी 110 यात्री और 5 रेल कर्मियों की मौत हो गई थी। समुद्री तूफ़ान से धनुषकोडी गांव के 1800 से अधिक जनों की जान भी चली गई थी। कहा जाता है कि समुद्री तूफानी लहरें रामेश्वरम के रामनाथ स्वामी मंदिर के ठीक सामने ठहर गई थी।समुद्री तूफ़ान से बचने के लिए इस मुख्य मंदिर में सैकड़ों श्रद्धालु शरण लिए हुए थे। इस समुद्री तूफ़ान के ध्वंशावशेष आज भी  धनुषकोडी और आसपास देखे जा सकते है।धनुषकोडी रेलवे स्टेशन, रेल लाइन, चर्च आदि के ध्वंशावशेष झकझोर देते हैं। धनुषकोडी गांव  आने के लिए सड़क और समुद्री मार्ग ही माध्यम है। जबकि इसके समुद्र तट तक रेतीले रास्ते से होकर जीप टेम्पो के जरिये जाना पड़ता है।सूर्यास्त के बाद यहां श्रद्धालुओं को पुलिस और नौसेना कर्मियों द्वारा न रुकने की हिदायत दी जाती है।
@ दिनेश ठक्कर बापा
(तस्वीरें श्रीमती प्रीति ठक्कर द्वारा)
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