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शनिवार, 14 नवंबर 2015

जागो शोषण मुक्त कल के लिए

जागो ऊंघता हुआ जमीर
जागो
क्योंकि समय बीतता जा रहा है
जागो क्योंकि बढ़ता जा रहा है
शोषकों का कुनबा
और निर्बाध फैलता ही जा रहा है
शोषकों का क्षेत्रफल
जागो क्योंकि फंसता ही जा रहा है
शोषण के जाल में निरंतर
दबा कुचला निर्धन बेबस बचपन
जागो हमारे सुनहरे भविष्य के लिए
और हमारे शोषण मुक्त कल के लिए

जागो क्योंकि
काम के बोझ तले बचपन
हो रहा है समय से पहले बूढ़ा
जागो क्योंकि
वर्तमान अभी सो रहा है
जागो क्योंकि अतीत तो
सदा के लिए सो गया है
जागो क्योंकि
भविष्य की राह में
स्वार्थी रोड़े अटका रहे हैं

जागो क्योंकि
पत्थर खदानों में
ईंट भट्ठों में
चारे वालों के चरागाह में
असहिष्णु बेदर्द बाजारों में
चाय वालों की दुकानों में
देश बेचने वालों के बंगलों में
भविष्य का शरीर
और मासूम जीवन
पसीने पसीने हो रहा है

जागो क्योंकि
आने वाला कल
नए सिरे से गढ़ना होगा
जागो क्योंकि
जुमलों से बात नहीं बनेगी
और न ही भविष्य रचेगा
जागो क्योंकि
वर्तमान को नींद से जगाना
और समय रहते सुधारना
अब आवश्यक हो गया है !
@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)





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