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शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

विकलांगता

हैदराबाद स्थित बिरला निर्मित वेंकटेश्वर मंदिर के निकट इस साधु वेश विकलांग भिखारी पर जब मेरी नजर पड़ी, तो उसके पीछे खड़ी महिला की गतिविधियो की तरफ भी ध्यान गया| वह श्रद्धालुओं से   मिले सिक्के और नोट बटोर कर पास में चिलम पीते बैठे व्यक्ति को सौंप रही थी| विकलांग भिखारी से वस्तुस्थिति पूछने पर उसने बताया कि चीलम पीते व्यक्ति और इस महिला ने उसे दैनिक वेतन पर अनुबंधित किया हुआ है| दो वक्त की रोटी भी देते है| इस इलाके में अधिकतर भिखारी भाड़े पर बैठाये गए हैं| कुछ ढोंगी अपाहिज भिखारी भी है| कुछ अनाथ बच्चों से भी भीख मंगवाई जाती है| हर गिरोह का इलाका बंटा हुआ है|
यह हालात जानने के बाद चंद पंक्तियाँ लिपिबद्ध हो गई|
विकलांगता
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विकलांगता
शरीर में नहीं
सोच में होती है
शोषण
करते है हर हालात में
नहीं इसकी कोई सीमा
शोषक
भुनाते हैं हर स्थिति को
नहीं इनका कोई धर्म ईमान
नहीं कोई नाता मानवता से
रौंदते है बेबस बचपन को
खून चूसते हैं विवशता का
धन पशु बन कर ये जीते हैं
शोषक लोभवश स्वयं को
ज़िंदा रह कर मुर्दा बना लेते
कब्र पर भी दूकान सजाते है
अंततः
बेमौत मिट्टी में मिल जाते है !
@ दिनेश ठक्कर बापा
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