अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

पाखंडी मुखौटे पहने हैं

पाखंडी मुखौटे पहने हैं
अधर्मी कृत्य कर
धर्म ध्वज फहरा रहे हैं
चरित्र कलंकित कर
चेहरा चमका रहे हैं
चालचलन बिगाड़ कर
आस्था का चोला ओढ़े हैं
डमरू बजा कर
रास लीला रचा रहे हैं
बांसुरी की तान छेड़ कर
तांडव मचा रहे हैं
त्रिशूल थाम कर
राधे राधे आलाप रहे हैं
औंधे मुंह गिरने पर
हर हर गंगे जाप रहे हैं
हमें मुखर होकर
उनका मुखौटा उतारना है
हमें अलख जगा कर
उनका गोरखधंधा बंद कराना है
हमें सच्चाई की राह पर चल कर
उनको सलाखों के पीछे पहुंचाना है

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र : गूगल से साभार)

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

भूखे इंसानों के बनाए देवी देवता

दो वक्त की रोटी की चाहत में
बस्ती के मुहाने पर
सड़क के किनारे तंबू लगा कर
भूखे इंसानों का परिवार
पत्थरों को तराश कर
ईमानदारी से गढ़ रहा है
देवी देवताओं का परिवार
उनकी छेनी हथौड़ी का प्रहार
आस्था को दे रहा है आकार
बेबस अशक्त और निर्धन हाथ
बेजान पत्थरों में प्राण फूंक कर
रच रहे शक्ति और धन की देवी
अन्न संकट से जूझ रही काया
रच रही संकट मोचन की काया
जमाने की दुत्कार झेलता हुनर
पत्थरों को दे रहा पूज्य आकार

भूखे इंसानों के बनाए देवी देवता
बिकने के लिए हो गए हैं तैयार
सज गए हैं वे सड़क के किनारे
रोजी रोटी मिलेगी इनके सहारे
इनकी कोई कीमत तय नहीं है
मोलभाव से ही इन्हें बिकना है
पिपासु क्रेता की पारखी नजर
देवी देवताओं का करेंगी उद्धार
जिनकी होगी भव्य प्राण प्रतिष्ठा
उनकी बढ़ेगी भक्तजनों में निष्ठा
जल्द बिक गए ऊंचे दाम पर
चमक दमक वाले देवी देवता
देर से बिके औने पौने दाम पर
सादे रूप रंग वाले देवी देवता
बिके बिना धरे रहे सड़क पर
ज्ञान और बुद्धि के देवी देवता

उधर, तंबू के पीछे आश्रम में
उच्च तकनीक से हुए हैं तैयार
अत्याधुनिक देवी और देवता
आशाओं के ये बाबा बापू माता
नाच कर इन्हें रिझाना आता
भक्तों को गोद में बैठ-बिठा कर
झप्पी देकर चूना लगाना भाता
सभा में कृपा की कर रहे बौछार
कचौड़ी पकौड़ी चटनी खिला कर
दिव्य शक्ति का सपना दिखा कर
दुख भरे दिन बीतने का दावा कर
भक्तों की जेब पर डाल रहे हैं डाका
लूटखसोट का छोड़ते नहीं हैं मौका

तंबू के सामने जब गुजरा काफिला
तब भूखे इंसानों का परिवार
रथारूढ़ देवी देवताओं को देख कर
दुबक गया एक किनारे
पाखंडियों का प्रपंच देख कर
दुखी हो गया शिल्पकार परिवार
मासूम बेटी ने पिता से पूछा -
इन देवी देवताओं को किसने बनाया
ये तो पत्थर के नहीं हैं ?
पिता ने रूंधे स्वर में जवाब दिया -
इन्हें अंधभक्तों ने बनाया है
इनका ह्रदय पत्थर का है !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र : गूगल से साभार)






 

 


 

 


सोमवार, 10 अगस्त 2015

टोपीधर भुजंगराज

लोकतंत्र के चंदन वन से कूच कर
टोपीधर भुजंगराज
अंध भक्तों की बस्ती में आ गए हैं
वे फन उठाए हुए हैं
उन्हें तुमसे
तुम्हें उनसे
परस्पर खतरा है
उन्होंने खतरा भांप लिया है
तुम्हें भी ज्ञान चक्षु खोलना होगा
उनसे ज्यादा सतर्क रहना होगा
तुम्हें भी अब सिर उठाना होगा
हाथ जोड़ना
फूल चढ़ाना
दूध पिलाना
बीन बजाना
मिथकीय मूर्खता बंद करना होगा
अंध विश्वास छोड़ना होगा
अन्यथा डंस लिए जाओगे
उनके जहर की मारकता समझना
अपने खून को नीला न होने देना
जिंदा इंसान की तरह ही जीना  
अपने सोए जमीर को जगाओ
भीतर की आग को बाहर लाओ
फिर तुम देखना
जन आक्रोश की आग से डर कर
डराने वाले फन समेट कर
कैसे सरपट भाग कर
चूहे के बिल में छिप जाएंगे
टोपीधर भुजंगराज !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र : गूगल से साभार)







रविवार, 2 अगस्त 2015

सफेदपोश

सफेदपोश अपने चेहरे में
सभी कालिख छिपा लेते
सफेद उजले परिधानों में
काले कारनामे ढक लेते
काली करतूतों की देह में
बेईमानी की दुर्गंध दबा लेते  
अमीरी की नकली सुगंध से
गरीबी की नाक में दम करते
काले धन से भरी तिजोरी में
ईमान और शर्म भी रख देते
संरक्षकों की कृपा के फेर में  
सुरा-सुंदरी भी मुहैया कराते
मद्य निषेध और बेटी बचाने  
छलावा मात्र सदैव आगे रहते

राक्षसी प्रवृत्ति से धनी बन कर
दैविक कार्यों का दिखावा करते
समाज की आंखों में धूल झोंकते
अपने काले धन को सफेद करने
सामजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि करने    
आड़े तिरछे हर हथकंडे अपनाते
मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघते
कोई कसर वे बाकी नहीं रखते
प्रपंच के सभी सफेदपोश नुसखे  
इनके काले धंधे से ही निकले है  

सफेदपोशों के मुखौटे उतारने होंगे
असली चेहरे अनावृत्त करने होंगे
इनके काले धंधे उजागर करने होंगे
समय रहते इनके कुचक्र रोकने होंगे

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र : गूगल से साभार)