अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

शुक्रवार, 29 मई 2015

जंगल के बूढ़े राजा के दिन फिरे

अशक्त हुए शातिर बूढ़े शेर ने
समय की नजाकत देखते हुए
जंगल पर राज कायम रखने
अब बदल दिए हैं अपने पैंतरे
समय रहते भांप लिए हैं खतरे
बदले हैं जंगल के कानून पुराने
बिना शिकार गोश्त मिलता रहे
मांद में बैठ कर भूख मिटती रहे
भेड़ियों को बना लिया है शागिर्द
गुर्गों को दिए हैं शिकार अधिकार
सिखा दिए हैं शिकार के कई गुर

प्रतिनिधि भेड़िये विचरते हैं अब
भेड़ों के झुण्ड में शामिल होकर
गच्चा देने अपना ली उनकी चाल
भरोसा जीत लिया साथी बन कर
खुश किया है नरम घास खिलाकर
खुद भी घास खाते अपच होता जब
भेड़-झुण्ड आदी हुआ नमक खाकर
नमकीन जमीन मुहैया हो गई अब
आकर्षित करती नमक की नांदें अब
नमक चाटने भटकना न पड़ता अब
भेड़ों का खून लजीज हो गया है अब
भूख भी जिंदा रखने सफल हुए अब
मांसल बना दिया है नमक चटा कर
भेड़ियों को नमक सहज मिलेगा अब  
भेड़ों के ही खून-गोश्त से मिलेगा अब
भेड़ों ने समझी नहीं भेड़ियों की चाल
निर्भय रहे उनके खूनी पंजे देख कर
सहमे नहीं नुकीले दांत भी देख कर
भेड़चाल वाले झुण्ड ने नहीं सोचा तब
अनदेखी कभी आएगी मौत बन कर

इधर, समर्थक सियारों का "हुआ हुआ"
भेड़ियों के पक्ष में तेज हो गया है अब
जंगल जंगल यह कोलाहल तेज हुआ
अंधे-गूंगे भेड़ों के कान पक गए अब
भेड़ियों के लिए शिकार आसान हुआ
बेबस भेड़ों के सामने मौत खड़ी है अब
छोटा होता जा रहा भेड़ों का झुण्ड अब

उधर, बूढ़े शेर को भी गोश्त मिल रहा अब
बैठे बैठे शिकार में हिस्सा पहुंच रहा अब
खुद भी खा रहें हैं, दूसरों को भी खाने दे रहे      
भेड़ियों का खेमा बढ़ाने पूरा जोर लगा रहे
जंगल के बूढ़े राजा के दिन फिर गए है अब

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र : गूगल से साभार)





एक टिप्पणी भेजें