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शुक्रवार, 22 मई 2015

लोकतंत्र का खुला चरागाह

लोकतंत्र के खुले चरागाह में
बरसों तक बेखौफ चरते रहे
चराई का हक वो विरासत में
अपने चरवैयों को भी देते रहे
शातिर दिमाग से सौदों में
दलाली का चारा खाते रहे
गिद्ध दृष्टि से हर शिकार में
अपना निवाला झपटते रहे
नुकीले दांतों से आपस में
चबा कर उदरस्थ करते रहे
बारी बारी भ्रष्टाचारी पेट में
देश की संपदाएं समाते रहे
भूख मिटाने के चक्कर में
जंगल-पहाड़ भी लीलते रहे
कोयला निगल कर पेट में
पाचन शक्ति को बढ़ाते रहे
बेबस अन्नदाताओं के पेट में
लात मार कर खेत हड़पते रहे
बेमेल गठबंधन वाली देह में
चराई की चमक छिपाते रहे
आम जनता की आंखों में
हर बेला में धूल झोंकते रहे
जन आक्रोश के चक्रवात में
फिर वे किसी लायक नहीं रहे

लोकतंत्र के इस खुले चरागाह में
पुराने को खदेड़ने नए सफल रहे
नए जुटे अब हरा हरा दिखाने में
जन आशाओं को सिंचित कर रहे
बहुमत की घंटी बांध कर गले में
हरियाली का सपना वे दिखा रहे
लगे हैं धैर्य की मेढ़ ऊंची उठाने में
जनता को ही कार्यकर्ता बना रहे
जनाक्रोश का चक्रवात रोकने में
ईमानदारी का राग आलाप रहे  
पारदर्शिता अपनी  पगुराने में
जुमलों की जुगाली वे कर रहे
पुराने के चराई कर्मों की आड़ में
छवि अपनी साफ सुथरी बता रहे
जाकर वे पराए देश की धरती में
देश शर्मिंदा होने की बात कह रहे

लोकतंत्र के इस खुले चरागाह में
आए नए झुण्ड अब निर्बाध चर रहे
चुपचाप सफाई से जुटे हैं चराई में
इसे वे आशाओं की बगिया दर्शा रहे
भलाई बता रहे एक दो मौका देने में
दुख भरे दिन बीतने का दावा कर रहे
भरोसा नहीं हो रहा इनके चरावर में
गोधूलि बेला में भी घर नहीं लौट रहे

लोकतंत्र के इस खुले चरागाह में
पुराने हों या नए चरिंदे
चरते चरते
जी चाहे जितना गोबर उलीचिए
हाथों से जितने कंडे थाप लीजिए
दोनों ही तुम्हारे अधिकार में हैं
किंतु दाग लगता है देश के दामन में  
हथकंडों की सड़ांध कब तक सहते रहें?

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र : गूगल से साभार)


   
 

 







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