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मंगलवार, 19 मई 2015

खौल रहा है खून जवानों का












सरहद पर बहा खून जवानों का
बरसों बाद भी सूखा नहीं है
बर्फबारी के बावजूद
रह रह कर खौल उठता है
भूला नहीं है अपना वजूद
वह अब भी हिसाब मांग रहा है
अपने कतरे कतरे का
बरसों बाद भी भरा नहीं है
घाव देशभक्त सीने का
सीमा अतिक्रमण के बावजूद
भरोसा किया जा रहा है
रिश्तों पर जमी बर्फ पिघलने का
कूटनीति से षडयंत्र हो रहा है
बहे खून पर पानी फेरने का
निवेश के बहाने प्रयास हो रहा है
खौलते खून को ठंडा करने का
दिखावटी दोस्ती के बावजूद
सरहद पर दुश्मनी कायम है
बर्फीले तूफान के बावजूद
खौल रहा है खून जवानों का
खौलता खून लावा बन सकता है
बिगाड़ने नहीं देगा नक्शा देश का
चुभने वाली शीतलहर के बावजूद
तना हुआ है सीना देशभक्ति का
चालबाजी के घने कोहरे के बावजूद
असली चेहरा दिख रहा दुश्मन का
फूंक फूंक कर छाछ पीना जरूरी हैं
घाव भरा नहीं है दूध से जलने का
दोस्ती का दर्रा खोलने के बावजूद
दुश्मनी की सुरंग बननी जारी है
अतः, खौल रहा है खून जवानों का

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र : गूगल से साभार)

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