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गुरुवार, 14 मई 2015

चौकीदार बन कर लूटना बंद करो

ऐ सूट-बूट वाले आकाओं
चौकीदार बन कर लूटना बंद करो
जनता चैन की नींद सो रही है
उसका सुख चैन लूटना बंद करो
दुखों का अंधेरा अभी चौतरफा है
काली रात का सन्नाटा पसरा है
झींगुरों का कोलाहल बढ़ गया है
लोकतंत्र की घुमावदार गलियों में
सतर्कता की सीटी बजाना बंद करो
जागते रहो चिल्लाना अब बंद करो
जितना लूटना था लूट लिए
अपने अपने घर भर लिए
सबने हाथ साफ किया बारी बारी
सही नहीं जाती तुम्हारी सेंधमारी
बहुत भारी पड़ी तुम्हारी चौकीदारी  
सबक सिखाएंगे तुम्हें अबकी बारी

काली रात भी बीत जाएगी
वो सुबह भी जल्द आएगी
जनता जब जाग जाएगी
जमीर की आंखें खुल जाएगी
लुटेरों की नींद उड़ जाएगी
सेंधमारों की शामत आएगी
पैरों तले जमीन खिसक जाएगी
लूटमारी भी तब बंद हो जाएगी
आकाओं की अकड़ मिट जाएगी
लबों को आजादी मिल जाएगी

जन पौरूष जब जाग जाएगा
हक का बिगुल तब बज जाएगा
चौकीदार का तमगा छिन जाएगा
असली चेहरा सामने आ जाएगा
फर्जी चोला उतर जाएगा
सूट-बूट नीलाम हो जाएगा
आंखों के सामने अंधेरा छा जाएगा
बुरे दिनों का आगाज़ हो जाएगा
जनता को सुख चैन मिल जाएगा

लूटमार घर में हो या खेत खदान में
खजाना तो देश का ही खाली होता है
लोकतंत्र की घुमावदार गलियों में
सेंधमारी से देश को ही सेंध लगती है  
इसलिए, ऐ सूट-बूट वाले आकाओं
चौकीदार बन कर लूटना बंद करो

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र : गूगल से साभार)
 
 
 


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