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बुधवार, 7 जनवरी 2015

बूँद बूँद मरते हुए बहना होगा

गंदगी
क्यों न अधिक हो
पाप
क्यों न उससे भी अधिक हो
क्यों न अपनी नाक बंद कर
मेरी पीठ पर पाँव रख कर
वह नित्य डुबकी मारता हो
क्यों न मेरे अंग में शेष हो
केवल उतनी ही स्वच्छता
जितनी एक कब्र पर होती है
फिर भी बहना विवशता हो
इसी गंदगी में ही बहना होगा
इसी पाप को धोते रहना होगा
धारोधार रोते हुए बहना होगा
बूँद बूँद मरते हुए बहना होगा
पाप का घड़ा वृहत क्यों न हो
पीठ पर लाद कर बहना होगा  
उद्गम से मोक्ष के सागर तक
गंगा बन कर ही बहना होगा

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र मेरे व श्रीमती प्रीति ठक्कर द्वारा)  

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