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शनिवार, 3 जनवरी 2015

तब मानेंगे यह बहता पानी नहीं गंगा है

मान भी लें यह बहता पानी नहीं गंगा है
डुबकी से पाप धोने वाली पवित्र नदी है
प्रवाहित मृत देह को स्वर्ग पहुँचाती है
विसर्जित अस्थियों का उद्धार करती है

किंतु मन यह भी मानने का इच्छुक है
कि यहीं आतंकवाद डुबकी से डूब जाए
द्वेष दुर्भावना शर्म से पानी पानी हो जाए
धर्म जाति का जहर धुल कर बह जाए
भ्रष्टाचार प्रवाहित होकर ख़त्म हो जाए
महंगाई बह कर सबका उद्धार कर जाए
गरीबी गल कर मौत के घाट उतर जाए
मोटी चर्बी किसी कुपोषित पर चढ़ जाए
तोंद भूखे के पिचके पेट से चिपक जाए
जो न होना चाहिए खाली कर दिया जाए
तब मानेंगे यह बहता पानी नहीं गंगा है

गंगा सिर्फ सभ्यता का प्रतिमान नहीं है
आस्थायुक्त यह नदी जीवनदायिनी भी है
पवित्रता कायम रखना सबका कर्तव्य है
तब मानेंगे यह बहता पानी नहीं गंगा है

गंगा को स्वच्छ रखना श्रद्धालु धर्म माने
निर्मलता का कर्मकाण्ड करना भी जाने
गंगा क्षेत्र वासी इसका ऋण चुकाना जाने
तब मानेंगे यह बहता पानी नहीं गंगा है

गंगा को राजनीति का दलदल न बनाएं
सफाई के नाम पर स्वार्थी जेब न भर जाए
रखवाली के लिए जनता चौकन्नी हो जाए
गंगा आरती कर संकल्प ले लिया जाए
यहीं क्रांति दीप प्रवाहित कर दिया जाए
तब मानेंगे यह बहता पानी नहीं गंगा है

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र मेरे व श्रीमती प्रीति ठक्कर द्वारा)  


 




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