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शनिवार, 10 जनवरी 2015

लहू से नहीं मिटेंगी ये लकीरें


लकीरों नें जब आतंकवाद को
उसका असली चेहरा दिखाया
तो भीतर का हैवान जाग गया
नकाब पहन कर सामने आया  
पहुँच गया मिटाने लकीरों को
खून से ही रंग दिया लकीरों को
तो लकीरों ने नया रूप दिखाया
अभिव्यक्ति को और उभार दिया
साथी लकीरों का साहस बढ़ाया
आसमान तक हौंसला पहुँचाया
जमीन दिखाई आतंकवाद को
लकीरों ने चेता दिया हैवान को
खून से नहीं हो सकता सफाया
बोल उठी हैं विरोध की लकीरें
लहू से नहीं मिटेंगी ये लकीरें
साथ है इंसानियत का साया
 
@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र गूगल से साभार)


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