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गुरुवार, 1 जनवरी 2015

धूप सोखने वाले दिनों की साँझ ढल जाने दो

बीते पलों के लिए आँसू बहाना ठीक नहीं
आँखों को अपना सुनहरा भविष्य देखने दो
पलकों को वर्तमान के लिए खुली रहने दो
होठों को भूतकाल के लिए रूलाना ठीक नहीं

व्यतीत क्षणों के लिए ठहराव ठीक नहीं
समय के साथ हाथ पाँवों को चलने दो
प्रगति पथ पर तारीखों के काँटे चुभने दो
स्वयं रास्ते का पत्थर बनना ठीक नहीं

जीवन के क्षणों को व्यर्थ गंवाना ठीक नहीं
समय के सीने पर कर्म ह्रदय को धड़कने दो
आतंकी दिनों के खिलाफ खून को खौलने दो
इंसानियत के कैलेण्डर को फाड़ना ठीक नहीं

समय की नदी का सूख जाना ठीक नहीं
उम्मीदों का पानी सदैव बहते रहने दो
अच्छे दिनों की नाव चलते रहने दो
आश्वासनों का बाँध बनाना ठीक नहीं

गुजरे लम्हों के लिए शोक मनाना ठीक नहीं
समय के सितारों को स्वतः टूटने बिछड़ने दो
अपने जीवन को आकाश जैसा आत्मबल दो  
दुखी तिथियों का अपने दिन गिनना ठीक नहीं

जीवन के त्रासदीयुक्त अँधेरे से डरना ठीक नहीं
धूप सोखने वाले दिनों की साँझ ढल जाने दो
आशाओं का सूरज डूबता है तो फिर उगने दो
समृद्ध सुबह के लिए सोए रह जाना ठीक नहीं  

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
 (तस्वीर मेरे और श्रीमती प्रीति ठक्कर द्वारा)

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