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मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

कन्याकुमारी स्थित संत कवि तिरुवल्लुवर स्मारक

कन्याकुमारी में हिन्द महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के संगम स्थल में एक चट्टान पर निर्मित संत कवि तिरुवलुवर स्मारक उनके श्रेष्ठतम प्राचीन तमिल साहित्य सृजन को समर्पित है। तिरुवल्लुवर तमिल साहित्य में विशिष्ट और श्रद्धापूर्ण स्थान प्राप्त प्राचीन महाकाव्य ग्रन्थ "तिरुक्कुरल" के रचयिता थे। तमिल भाषा में लिखित यह मुक्तक काव्य ग्रन्थ नीतिशास्त्र पर आधारित है। इसकी रचना का काल ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी से लेकर छठवीं शताब्दी के मध्य माना जाता है। हालांकि इनके अस्तित्व और कृतित्व  के कालखंड का अनुमान पुरातात्विक साक्ष्यों के बजाय भाषायी साक्ष्यों के आधार पर लगाया गया है। नैतिकता का विशेष बोध कराने वाला "तिरुक्कुरल" तीन खण्डों, अरम (आचरण-सदाचार), परूल (सांसारिकता-संवृद्धि) और इंबम (प्रेम-आनद) में विभाजित है। धर्म, अर्थ और काम काण्ड में विभक्त इस कृति के कुल 133 अधियाकरम (अध्याय) है। प्रत्येक अध्याय में दस कुरल (दोहे) हैं। तिरुवल्लुवर ने अपनी इस कृति के धर्म काण्ड में अध्यात्म, भक्ति, गृहस्थ जीवन, व्यक्तिगत सदाचार विचार व्यवहार पर ख़ास जोर दिया है। अर्थ काण्ड में जन कल्याणकारी राज धर्म, राजनीतिक कर्म, आदर्श शासक के कर्तव्य दायित्व, राज्य की बेहतर  अर्थव्यवस्था आदि पर बल दिया है। काम काण्ड में पुरूष महिला के बीच आदर्श समर्पित प्रेम संबधों की व्याख्या भी की गई है। उन्होंने इसके जरिए लोगों को यह सन्देश भी दिया है कि पवित्र आध्यात्मिक दिव्य जीवन जीने की खातिर अपने परिवार का त्याग कर सन्यासी बनने की जरूरत नहीं है। गृहस्थ रह कर भी ऐसा इच्छित जीवन जी सकते हैं। बताया जाता है कि गीता के बाद तिरुक्कुरल का देश विदेश की सर्वाधिक भाषाओ में अनुवाद हो चुका है।
 इतिहासकारों का कहना है कि तिरुवल्लुवर का जन्म मायलापुर (वर्तमान चेन्नई का एक हिस्सा) में हुआ था। सात भाई बहनों में वे सबसे छोटे थे। इनके माता पिता ने संतानों को त्याग दिया था। एक दंपती ने तिरुवल्लुवर को पाला पोसा था। जुलाहा कार्य और वैचारिक रूप से समानता की वजह से तिरुवल्लुवर को तमिल साहित्य का कबीर भी माना जाता है। पत्नी वासुकि उनके प्रति अत्यंत समर्पित थी। तिरुवल्लुवर को थेवा पुलवर, वल्लुवर, पोयामोड़ी पुलवर जैसे नामों से भी जाना जाता है। इनके जीवन का अधिकाँश समय मदुरै में व्यतीत हुआ था। तमिल साहित्य को बढ़ावा देने वाले पांड्य शासक के दरबार में ही इनकी कृति तिरुक्कुरल को श्रेष्ठ ग्रन्थ बतौर मान्यता दी गई थी। तिरुवल्लुवर के धर्म-जाति संबंध को लेकर विद्वानों में मत विभिन्नता है। शैव, वैष्णव, बौद्ध, जैन मतावलंबियों के जुड़ाव संबंधी विरोधाभासी तर्क है। कुछ का मानना है कि वे जैन मुनि थे, क्योंकि तिरुक्कुरल का प्रथम अध्याय जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव को समर्पित है। साथ ही इस कृति के कई शिक्षा-सन्देश भी जैन धर्म की शिक्षाओं से मिलते जुलते हैं। कुछ शोधकर्ताओं ने उन्हें तमिल परम्परा में परैयार के रूप में निरूपित किया है। जबकि कन्याकुमारी ऐतिहासिक सांस्कृतिक शोध केंद्र का दावा है कि तिरुवल्लुवर राजा थे। उन्होंने पहाड़ी क्षेत्र वल्लुवनाडु पर शासन किया था।
बहरहाल, तमिलनाडु राज्य सहित पूरे दक्षिण भारत में श्रद्धेय संत कवि बतौर इनके प्रति आस्था और सम्मान प्रकट किया जाता है। इसी परिप्रेक्ष्य में कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक के निकट तिरुवल्लुवर की 133 फुट ऊंची प्रतिमा भी स्थापित की गई है। इनकी कृति तिरुक्कुरल के अध्यायों की कुल संख्या भी 133 है। हालांकि प्रतिमा की वास्तविक ऊंचाई मात्र 95 फुट है जो 38 फुट ऊँचे शिला मंच पर खड़ी है। तिरुक्कुरल के धर्म संबंधी अध्याय भी 38 हैं। इसके अलावा तिरुवल्लुवर की तीन अंगुलियां इनकी कृति के तीन खंड अरम, परूल और इंबम का प्रतिनिधित्व करती हैं। इस स्मारक की आधारशिला वर्ष 1979 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई द्वारा रखी गई थी, लेकिन निर्माण कार्य किन्हीं कारणों से शुरू न हो सका। फिर सात सितम्बर, 1990 को निर्माण कार्य शुरू हुआ, जो 1999 में पूर्ण हुआ। एक जनवरी 2000 को तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा. मु. करूणानिधि  ने इस स्मारक को लोकार्पित किया था। पत्थर और कांक्रीट से निर्मित इस स्मारक के डिजाइनर डा. वी. गणपति स्थापति हैं। यह स्मारक भी पर्यटकों और साहित्य प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र है। सूर्यास्त के बाद यहां की रंगबिरंगी रोशनी से स्मारक का आकर्षण बढ़ जाता है।
@ दिनेश ठक्कर बापा

सोमवार, 30 नवंबर 2015

जुबाँ पर लगाओ लगाम


जुमलों की चिकनी चुपड़ी
सड़क पर
बेकाबू होकर भागती
जुबाँ पर लगाओ लगाम
उसे रखो काबू में
तलुओ में ठोंको नाल
लोकतंत्र के सफर में
निर्जीव न समझो
रास्ते के पत्थरों को
जब वे उछले
तब चोट लगी गहरी
बिगड़ गया चाल चेहरा
हालत हालात यह है
जो जुबाँ
भागा करती थी सरपट
वो अब
रेंग रही है हांफते हुए
बंद हो गई है बोलती
जो जुबाँ
उगला करती थी आग
उस पर
अब फिर गया है पानी !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार )

रविवार, 29 नवंबर 2015

कन्याकुमारी स्थित गांधी स्मारक मंडपम

कन्याकुमारी में महात्मा गांधी की स्मृतियों को जीवंत बनाये रखने के उद्देश्य से वर्ष 1956 में गांधी स्मारक  मंडपम बनाया गया था। महात्मा गांधी वर्ष 1937 में कन्याकुमारी पधारे थे। कन्याकुमारी की प्राचीन महत्ता, त्रिवेणी संगम और इसके प्राकृतिक सौंदर्य से वे अत्यंत प्रभावित हुए थे। इसीलिये उनके देहावसान के पश्चात अस्थियां यहां समुद्र में विसर्जित की गई थी। उनकी स्मृति स्वरूप समुद्र तट पर निर्मित इस स्मारक मंडपम का वास्तु और स्थापत्य शिल्प बेहद आकर्षक तथा अनूठा है। इसके आकार प्रकार की प्रमुख विशेषता यह है कि महात्मा गांधी की जन्म तिथि पर सूरज की पहली किरणें उनकी समाधि पर पड़ती हैं, जहां उनकी राख श्रद्धापूर्वक सम्हाल कर रखी गई है। कन्याकुमारी आने वाले श्रद्धालुओं और पर्यटकों में यह स्मारक मंडपम भी आकर्षण का केंद्र है।

@ दिनेश ठक्कर बापा

शनिवार, 28 नवंबर 2015

कन्याकुमारी स्थित स्वामी विवेकानंद शिला स्मारक

कन्याकुमारी के तट से करीब पांच सौ मीटर दूर समुद्र के बीच दो विशाल चट्टानों में से एक पर निर्मित स्वामी विवेकानंद स्मारक का स्थापत्य शिल्प आकर्षक है। कहा जाता है कि स्वामी विवेकानंद देश का प्रचार करने विदेश प्रस्थान से पूर्व वर्ष 1892 में कन्याकुमारी पधारे थे। इसी चट्टान पर उन्होंने तीन दिनों तक ध्यान साधना की थी। जिसके बाद उन्होंने "मानव सेवा ही माधव सेवा" सहित कई कल्याणपरक सन्देश दिए थे।
वर्ष 1963-64 में पूरे देश में स्वामी विवेकानंद जन्म शताब्दी वर्ष मनाया गया था। इस मौके पर गठित विवेकानंद शिला स्मारक समिति ने इसी ऐतिहासिक चट्टान पर स्मृति सम्मान बतौर स्मारक बनाने की योजना बनाई थी, जो वर्ष 1970 में साकार हुई थी। स्मारक निर्मित होने के पश्चात मानव सेवा के सन्देश को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान करने के निमित्त विवेकानंद केंद्र की स्थापना भी हुई थी।
जानकारों का कहना है कि इसी चट्टान पर प्राचीनकाल में देवी का मूल मंदिर था, जो कालान्तर में तट के निकट स्थानांतरित कर दिया गया था। यह भी मान्यता प्रचलित है कि इसी चट्टान पर देवी कन्याकुमारी ने भी तपस्या की थी। इस चट्टान पर प्राकृतिक रूप से बने चरण चिन्ह को श्रद्धालु देवी के चरण चिन्ह बतौर पूजते हैं। इसीलिये यह चट्टान "श्रीपाद पारै" (चट्टान) के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस चट्टान पर ही श्रीपाद मंडपम, विवेकानंद मंडपम और ध्यान मंडपम बने हैं। धातु निर्मित स्वामी विवेकानंद की आदमकद प्रतिमा बेहद आकर्षक है।
स्मारक परिसर में स्वामी विवेकानंद साहित्य प्रदर्शन विक्रय केंद्र भी स्थापित किया गया है। यह स्मारक स्थल कन्याकुमारी आने वाले पर्यटकों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। कन्याकुमारी के तट से यहां तक आने जाने बोट का सफ़र भी रोमांचकारी रहता है। शाम के बाद इस स्मारक स्थल की रंग बिरंगी प्रकाश सजावट मन मोह लेती है।
@ दिनेश ठक्कर बापा

कन्याकुमारी से कामनाएं



खड़ा हूँ मैं तट पर कन्याकुमारी के
यह संगम स्थल है
हिंद महासागर
बंगाल की खाड़ी
और अरब सागर का
तीन रंगों वाले पानी का मिलन स्थल है
कन्याकुमारी
उगते और ढलते सूरज का साक्षी स्थल है
कन्याकुमारी
चोल, चेर, पांड्य का राज स्थल रहा है
कन्याकुमारी
पौराणिक कथा मिथकों का स्थल रहा है
कन्याकुमारी
परशुराम के फरसे के गिरने से उभरा है
कन्याकुमारी
महाशक्ति अवतार कन्या का तप स्थल है
कन्याकुमारी
शक्ति-कन्या का शिव से विवाह न होने पर
कुँवारी रहने का प्रतिज्ञा स्थल है
कन्याकुमारी
कुँवारी कन्या से ही मरण का वरदान प्राप्त
असुर बाणासुर के अत्याचारों का साक्षी है
कन्याकुमारी
बाणासुर से देवी कन्या के युद्ध का स्थल है
कन्याकुमारी
कन्या के हाथों बाणासुर के वध का स्थल है
कन्याकुमारी

खड़ा हूँ मैं तट पर कन्याकुमारी के
त्रिवेणी संगम के मनोरम दृश्य के बावजूद
मन व्यथित सा है
कहते सुनते हैं
कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश एक है
भौगोलिक दृष्टि
और नक्शे से यह सच है
किन्तु मानसिक दृष्टि
और मन से क्या सचमुच हम एक हैं ?
जब सागर आपस में मिल सकते हैं
तो हमारा मन आपस में क्यों नहीं मिलता ?
अलगाववाद की लहरें क्यों झकझोरती हैं ?
सद्भाव भाईचारा देश प्रेम का संगम कब होगा ?
व्यथित कर रहे हैं यक्ष प्रश्न
देश की कन्या कुमारियों की अस्मत
आखिर कब तक लुटती रहेगी ?
कलयुगी बाणासुरों का खात्मा कब होगा ?
अशक्त कुपोषित निरक्षर कब तक रहेंगी
कन्या कुमारियाँ
बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के जुमले नारे
आखिर सही अर्थों में कब फलीभूत होंगे ?

खड़ा हूँ मैं तट पर कन्याकुमारी के
प्रार्थना है शक्ति की देवी कन्याकुमारी से
हे देवी
फिर से जन्म लीजिए
और समूल खात्मा कीजिए
सर्वव्याप्त कलयुगी बाणासुरों का
ताकि सुरक्षित निर्भय शक्तिवान सुखी रहें
कन्या कुमारियां !
@ दिनेश ठक्कर बापा

गुरुवार, 26 नवंबर 2015

समंदर पर लहरों की उछलकूद


उछलकूद मचा रही हैं लहरें
सूर्योदय के समय समंदर पर
सर्द हवा के झोंके
टकरा रहे हैं आँखों में
नम कर रही हैं नज़रों को
किनारों से मिलने बेताब लहरें
यदि पलकें खोलें
तो भिगो देती हैं
समंदर की बेसब्र सी बूँदें
मुझे चैन से रहने दो
अपने पथरीले किनारों पर
सपने देखती आँखों पर
जागृत सूर्य किरणें रख दो
उछलकूद मचाती यह लहरें
मुझे कहीं असहिष्णु न कर दे !
@ दिनेश ठक्कर बापा

बुधवार, 25 नवंबर 2015

रामेश्वरम को जोड़ने वाला पम्बन रेलवे और रोड ब्रिज





रामेश्वरम द्वीप को तमिलनाडु राज्य के शेष हिस्से से जोड़ने वाला पम्बन रेलवे और रोड ब्रिज से गुजरना रोमांचकारी क्षण होता है। बताया जाता है कि ढाई मील चौड़ी खाड़ी को पार करने के लिए प्राचीन समय में यहां  केवल नावों का ही सहारा था। करीब चार सौ साल पहले राजा कृष्णप्पा नायकं ने इस पर पत्थरों का बड़ा पुल बनवाया था, जो कालान्तर में समुद्री तूफ़ान के कारण टूट गया था। फिर अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान जर्मन इंजीनियर की सहायता से उस टूटे पुल की जगह रेल सेवा के लिए आकर्षक पुल निर्मित किया गया। वर्ष 1963 में यह पम्बन रेलवे ब्रिज पुनः क्षतिग्रस्त हो गया। रेल प्रशासन ने इसके पुनर्निर्माण के लिए छह माह की अवधि निर्धारित की थी, किन्तु इस इलाके के इंचार्ज अफसर ने यह अवधि घटा कर तीन माह कर दी और इसकी जिम्मेदारी केरल निवासी सिविल इंजीनियर ई. श्रीधरन को सौंप दी गई। आश्चर्य की बात यह है कि उन्होंने केवल 45 दिनों के अंदर यह कार्य पूर्ण करके दिखा दिया। ज्ञात हो कि कोलकाता,  दिल्ली मेट्रो और कोंकण रेल सेवा भी पद्म विभूषण से सम्मानित ई. श्रीधरन के प्रखर मस्तिष्क, कुशल योजना, कार्यप्रणाली और सक्षम नेतृत्व की ही देन है।रामेश्वरम निवासी मिसाइल मैन डा.ए. पी.जे. अब्दुल कलाम के साथ मेट्रो मैन ई. श्रीधरन के आत्मीय संबंध थे। बहरहाल.पम्बन ब्रिज पहले जहाजों के आवागमन के लिए मध्य भाग से खुल कर ऊपर उठ जाया करता था। इस स्थान पर हिन्द महासागर का पानी दक्षिण से उत्तर की तरफ प्रवाहित होता दिखाई देता है। रामेश्वरम से चेन्नई करीब सवा चार सौ मील दूर दक्षिण पूर्व में है।समानांतर पम्बन रोड ब्रिज से भी आवागमन का आनंद अविस्मरणीय रहता है, बशर्ते मौसम अनुकूल हो।
@ दिनेश ठक्कर बापा

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

कलाम की कविता "खोज"



श्रद्धेय डा. ए. पी.जे. अब्दुल कलाम की अंतिम साँसों तक उनका कवि रूप भी प्रेरणादायी था। तमिल और अंग्रेजी में लिखी उनकी कविताएँ सोद्देश्य और संदेशपरक हैं। उनकी रचनाओं में ज्ञान, शांति, हरित क्रान्ति, खुशहाली आदि की चाहत और व्यथा भी झलकती है। रामेश्वरम स्थित डा. कलाम के परिजनों द्वारा संचालित स्मृति संग्रहालय  "हाऊस ऑफ कलाम" में उनकी चुनिंदा कविताओं के पोस्टर भी हिंदी में अनुवाद के साथ प्रदर्शित किये गए है। कविता "खोज" विशेष तौर पर ध्यान आकर्षित करती है-

मैं चढ़ते चढ़ते हाँफ रहा हूँ
कहाँ है शिखर ?
हे मेरे ईश्वर !
मैं खोद रहा हूँ जहाँ-तहाँ
ज्ञान का खजाना कहाँ है छिपा ?
हे परमपिता !
मैं दूर समंदर में खे रहा हूँ नैया
खोज रहा हूँ एक टापू
कहाँ है अमन ?
हे मेरे भगवान !
हे ईश्वर,
मेरे राष्ट्र को दो वरदान
मेहनत और ज्ञान का दान
जिससे खिल उठे खेत-खलिहान
आए हरियाली चारों ओर खुशहाली ।

सोमवार, 23 नवंबर 2015

रामेश्वरम में कर्मयोगी कलाम की स्मृतियों के संग




रामेश्वरम स्थित हाऊस ऑफ कलाम केवल दो मंजिला भवन नहीं, बल्कि कर्मयोगी डा. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम की अविस्मरणीय स्मृतियों की सर्व प्रिय अमूल्य  धरोहर है। यहां उनके बचपन से लेकर अंतिम साँसों तक की स्मृतियाँ संजो कर प्रदर्शित की गई है, जो हर वर्ग के लोगों के लिए प्रेरणादायी है। मिशन ऑफ लाइफ गैलरी वास्तव में सार्थक जीवन और देश के लिए जीने का संदेश देती है। यहां इनके पैतृक आवास, पूर्वजों की निशानी, संयुक्त परिवार की यादें, प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त रामेश्वरम का पंचायत प्राथमिक विद्यालय, प्रेरक रहे शिक्षकों के साथ तस्वीरें, अंतरिक्ष विज्ञान में स्नातक होने,  भारतीय रक्षा अनुसंधान एवम् विकास संस्थान, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में प्रवेश, परियोजना निदेशक बतौर स्वदेशी उपग्रह प्रक्षेपण यान परियोजना पर कार्य, रोहिणी का सफल मिशन, इसरो लांच व्हीकल प्रोग्राम, स्वदेशी लक्ष्य भेदी नियंत्रित प्रक्षेपास्त्र (गाइडेड मिसाइल) की डिजाइन, स्वदेशी तकनीक से अग्नि, पृथ्वी मिसाइल का निर्माण-परीक्षण, पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण, मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार, मार्गदर्शक वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. विक्रम साराभाई, प्रो. सतीश धवन, डा. ब्रम्हप्रकाश के साथ यादगार महत्वपूर्ण क्षणों की तस्वीरें, सर्वमान्य राष्ट्रपति बतौर कार्यकाल,  तत्पश्चात विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं में मानद फैलो, विजिटिंग प्रोफेसर और कुलाधिपति रहने के दौरान की तस्वीरें, भारत रत्न सहित विभिन्न राष्ट्रीय सम्मान, उपाधियाँ, पदक और तत्संबंधी समारोह के छाया चित्रों का अनूठा संग्रह प्रदर्शन दर्शकों को अभिभूत कर देता है। डा. कलाम का कर्नाटक भक्ति संगीत और शास्त्रीय संगीत से गहरा जुड़ाव था। सरस्वती वीणा, वेन्नई वादन की तस्वीर से यह स्पष्ट होता है।
मिसाइल मैन के नाम से श्रद्धापूर्वक स्मरण किये जाने वाले इस कर्मयोगी का साहित्यिक जीवन भी बेहद अनुकरणीय और प्रेरणादायक है। उनकी आत्मकथात्मक किताबें बच्चों और युवाओं को सार्थक राह दिखाती हैं। उनकी जीवन कथा पुस्तक "माय जर्नी"  के अलावा "इग्नाइटेड माइंड्स: अनलेशिंग द पावर विदिन इंडिया", "द ल्युमिनिअस स्पार्क्स: ए बायोग्राफी इन वर्स एंड कलर्स", "इंस्पायरिंग थॉट", "चिल्ड्रन आस्क कलाम", "मिशन इंडिया: ए विसन फॉर इंडियन यूथ", "गाइडिंग सोल्स: डायलॉग्स आन द पर्पस ऑफ लाइफ", कविता संग्रह "द लाइफ ट्री" आदि किताबें  सोद्देश्य जीवन कर्म का मार्ग प्रशस्त करती है। ये किताबें यहां प्रदर्शन और विक्रय के लिए रखी गई हैं। इस संग्रहालय का संचालन और रखरखाव डा. कलाम के बड़े भाई और भतीजे द्वारा किया जा रहा है। इसके अलावा वे बाजू वाले भवन में स्व रोजगार बतौर समुद्री सामग्री और उनसे बने सजावटी सामान, रत्न, रुद्राक्ष, पूजन आदि सामग्री का विक्रय भी करते है। बहरहाल,  डा. कलाम के असाधारण व्यक्तित्व और उनकी महती राष्ट्र प्रेरक उपलब्धियों को दर्शाने वाले इस संग्रहालय से लोग अपने साथ अमिट यादें लेकर लौटते है।
@ दिनेश ठक्कर बापा
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शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

रामेश्वरम का राम पादुका मंदिर

रामेश्वरम से लगभग डेढ़ मील दूर उत्तर पूर्व में गंधमादन पर्वत पर स्थित राम पादुका मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। इस मंदिर में काले पत्थर से निर्मित दो पादुकाओं, चरण चिन्ह की पूजा अर्चना भक्तों द्वारा की जाती है। श्रद्धालुओं में यह मिथक प्रचलित है कि यह चरण चिन्ह श्रीराम के हैं। इस मंदिर परिसर से रामेश्वरम का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है। यहां बेर और राम फल बेचने वाली ग्रामीण महिलाओं को शबरी स्वरूप मान कर श्रद्धालुजन उनसे यह सामग्री खरीद कर प्रसाद बतौर बाँटते भी हैं। गंधमादन पर्वत दरअसल एक छोटी सी पहाड़ी है, जिसके शिखर पर यह मंदिर बना है। भक्तों में ऐसी मान्यता है कि हनुमान जी ने समुद्र को लांघने के लिए यहीं से छलांग मारी थी। श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के लिए इसी स्थल पर ही अपनी सेना संगठित की थी।
@ दिनेश ठक्कर बापा

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

रामेश्वरम द्वीप का धनुषकोडी तीर्थ


रामेश्वरम द्वीप के दक्षिण दिशा की तरफ स्थित धनुषकोडी समुद्र तट पौराणिक मान्यता की दृष्टि से श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र है। एक मान्यता यह है कि श्रीराम ने अपने धनुष के एक छोर से इस स्थल को सेतु निर्माण के लिए चिन्हांकित किया था। दूसरी मान्यता हैं कि विभीषण के निवेदन पर श्रीराम ने अपने धनुष के एक सिरे से सेतु को तोड़ दिया था। इन्ही मान्यताओं के कारण इसका नाम धनुषकोडी पड़ा। श्रद्धालुओं में यह मान्यता भी है कि चारों धाम की यात्रा का समापन धनुष कोडी में स्नान पूजा अर्चना के बाद होता है। यह बंगाल की खाड़ी (महोदधि) और हिंद महासागर (रत्नाकर) का संगम स्थल भी होने के कारण इसकी पवित्रता अधिक मानी जाती है। यहां अस्थि विसर्जन और पितृ तर्पण भी किये जाने की प्रथा है। यहां से श्रीलंका 27 किमी दूर है। 22 दिसंबर 1964 की रात को श्रीलंका के वावुनिया को पार करते हुए भीषण समुद्री तूफ़ान ने धनुषकोडी रेलवे स्टेशन और गांव को अपनी चपेट में ले लिया था। पम्बन धनुषकोडी पैसेंजर ट्रेन समुद्र में समा गई थी। इस हादसे में सभी 110 यात्री और 5 रेल कर्मियों की मौत हो गई थी। समुद्री तूफ़ान से धनुषकोडी गांव के 1800 से अधिक जनों की जान भी चली गई थी। कहा जाता है कि समुद्री तूफानी लहरें रामेश्वरम के रामनाथ स्वामी मंदिर के ठीक सामने ठहर गई थी।समुद्री तूफ़ान से बचने के लिए इस मुख्य मंदिर में सैकड़ों श्रद्धालु शरण लिए हुए थे। इस समुद्री तूफ़ान के ध्वंशावशेष आज भी  धनुषकोडी और आसपास देखे जा सकते है।धनुषकोडी रेलवे स्टेशन, रेल लाइन, चर्च आदि के ध्वंशावशेष झकझोर देते हैं। धनुषकोडी गांव  आने के लिए सड़क और समुद्री मार्ग ही माध्यम है। जबकि इसके समुद्र तट तक रेतीले रास्ते से होकर जीप टेम्पो के जरिये जाना पड़ता है।सूर्यास्त के बाद यहां श्रद्धालुओं को पुलिस और नौसेना कर्मियों द्वारा न रुकने की हिदायत दी जाती है।
@ दिनेश ठक्कर बापा
(तस्वीरें श्रीमती प्रीति ठक्कर द्वारा)

शनिवार, 14 नवंबर 2015

जागो शोषण मुक्त कल के लिए

जागो ऊंघता हुआ जमीर
जागो
क्योंकि समय बीतता जा रहा है
जागो क्योंकि बढ़ता जा रहा है
शोषकों का कुनबा
और निर्बाध फैलता ही जा रहा है
शोषकों का क्षेत्रफल
जागो क्योंकि फंसता ही जा रहा है
शोषण के जाल में निरंतर
दबा कुचला निर्धन बेबस बचपन
जागो हमारे सुनहरे भविष्य के लिए
और हमारे शोषण मुक्त कल के लिए

जागो क्योंकि
काम के बोझ तले बचपन
हो रहा है समय से पहले बूढ़ा
जागो क्योंकि
वर्तमान अभी सो रहा है
जागो क्योंकि अतीत तो
सदा के लिए सो गया है
जागो क्योंकि
भविष्य की राह में
स्वार्थी रोड़े अटका रहे हैं

जागो क्योंकि
पत्थर खदानों में
ईंट भट्ठों में
चारे वालों के चरागाह में
असहिष्णु बेदर्द बाजारों में
चाय वालों की दुकानों में
देश बेचने वालों के बंगलों में
भविष्य का शरीर
और मासूम जीवन
पसीने पसीने हो रहा है

जागो क्योंकि
आने वाला कल
नए सिरे से गढ़ना होगा
जागो क्योंकि
जुमलों से बात नहीं बनेगी
और न ही भविष्य रचेगा
जागो क्योंकि
वर्तमान को नींद से जगाना
और समय रहते सुधारना
अब आवश्यक हो गया है !
@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)





बुधवार, 11 नवंबर 2015

हवा का रूख

दीप न बुझाओ
निर्धन देहरी के
देर नहीं लगती
बदलते
हवा का रूख
अंधेरा न फैलाओ
कच्ची छतों पर
समय नहीं लगता
बदलते
उजाले की दिशा।

दीपक जलाओ
मिलजुल कर
इंसानियत का
उजियारा फैलाओ
सेवा सद्भावना का
देर नहीं लगती
बदलते
हवा का रूख।

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

शनिवार, 7 नवंबर 2015

देश पर नहीं है किसी का एकाधिकार

अगर हमारे देश के
एक राज्य में जंगल राज है
तो क्या दिखाएंगे
दूसरे राज्य में भी जंगलीपन?
अगर एक राज्य में हो रहा है
कट्टर पंथियों द्वारा खूनखराबा
तो क्या बहाएंगे
दूसरे राज्य में भी निर्दोषों का खून?
अगर स्वार्थियों की मौन स्वीकृति है
तो हमें सतर्क रह कर
मुखर होने की आवश्यकता है।

देश पर नहीं है
किसी का एकाधिकार
और यह नहीं है
किसी की जागीर
कि एक ने कुछ सच कहा
तो दूसरा जुबान ही काट दे
कि एक ने कुछ सच लिखा
तो दूसरा उसका हाथ ही नहीं
गर्दन भी धड़ से अलग कर दे
कि एक ने कुछ सच दिखाया
तो दूसरा जीवन पर्दा ही जला दे
इसके बावजूद हम
संविधान सद्भाव के दायरे में रह कर
कुछ सच न कहें
कुछ सच न लिखें
कुछ सच न दिखाएं
कुछ चिंतन मीमांशा न करें
कुछ विचार विमर्श न करें
मात्र अपने में मस्त रहें
सिर्फ खा पीकर सोते रहें
सब कुछ देख सुन जान कर
बापू के बंदर जैसे बने रहें
और मुर्दे की तरह जीते रहें
तो हमें
नहीं है जीने का भी अधिकार।

इंसानियत का धर्म कर्म छोड़
स्व धर्म कुसंस्कृति की लेकर आड़
देश भक्ति का प्रमाण पत्र
लेने देने की मची है होड़
असहिष्णुता की सीमाएं लांघ कर
एक दूसरे को नीचा दिखा कर
देश छोड़ने की दे रहे है नसीहत
इस देश से भेजने
उस देश से बुलाने
हो रही है स्वार्थी सियासी जोड़ तोड़
इसके बावजूद हम
क्या यह सब कुछ बर्दाश्त करते रहेंगे?

यह कदापि न भूलो
निर्दोष का सरे राह बहा खून
निःशक्त का रक्तरंजित शव
निर्भया के साथ सामूहिक दुष्कर्म
देश ही नहीं
मानवता के लिए खुली चुनौती है
इसके बावजूद
क्या हमारा खून नहीं खौलेगा?

यह सब कुछ देख समझ कर भी
स्वार्थी नेताओं का मौन रहना
टोपीबाजों द्वारा कुर्सी हथियाना
देश भक्ति के जुमले उछालना
सद्भाव के नारों से भ्रमित करना
आम जनता को है धोखा देना
धर्म रक्षा के नाम पर
स्व हित साध रहे है
अधर्म के रखवाले
देश हित के नाम पर
अपना अपनों का भला कर रहें हैं
देश के स्वयंभू चौकीदार
इसके बावजूद ये सब
निर्लज्जता से जता रहे हैं
देश पर अपना एकाधिकार !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)




शुक्रवार, 30 अक्तूबर 2015

भविष्य जड़वत है जमीं पर

हैदराबाद के हुसैन सागर के निकट सड़क किनारे बैठे  वार्निश से पुते बच्चे को भीख माँगते देख कर ह्रदय उद्वेलित हो गया| आँखें नम हो गई| कुछ देर बाद इस बच्चे का पिता, जो शराब के नशे में धुत्त था, आया और सिक्के बटोर कर चला गया| सवाल करने पर यह बच्चा मौन साध कर मूर्तिवत बैठा रहा| इस नजारे को देख कर कुछ पंक्तियाँ लिपिबद्ध हो गई .....
भविष्य जड़वत है जमीं पर
--------------
कितना बेबस है बचपन
बदन है चांदी जैसा
फिर भी है कंगाल
किया गया है विवश
हाथ फैलाने के लिए
बैठाया गया है मूर्तिवत
भीख मागने के लिए
हाथ में होनी थी किताबें
थामे है भीख का कटोरा
बैठना था पाठशाला में
बैठाया गया फुटपाथ पर
तारे बैठे है बेबस जमीं पर
भविष्य जड़वत है जमीं पर
पिता नशे में उड़ते आसमां पर !
@ दिनेश ठक्कर बापा

शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

अगर मिटाना ही है तो .....
........................
धर्म, जात-पांत के नाम पर
दंगे, खून खराबा कराना
देश के लिए ठीक नहीं
अपने सिंहासन की खातिर
लोगों को आपस में लड़ाना
लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं

हिंदू अथवा मुस्लिम
सिख अथवा ईसाई
दलित अथवा सवर्ण
गरीब अथवा अमीर
सबका रक्त एक जैसा
इनमें भेदभाव ठीक नहीं
स्वार्थ की जमीन पर
विद्वेषी दीवार ठीक नहीं

मिट्टी में दफ़न
रक्तरंजित अतीत कुरेदना
विवादों के गड़े मुर्दे उखाड़ना
वर्तमान के लिए ठीक नहीं
अतीत के अपराध की सजा
भविष्य को देना ठीक नहीं

हर किसी का सूरज
किसी साँझ ढल जाएगा
दूसरे के हिस्से की घूप
हड़पना कतई ठीक नहीं
अपनी लकीर बढ़ाने हेतु
दूसरों की लकीर मिटाना
कतई ठीक नहीं
अगर मिटाना ही है
तो भूख गरीबी मिटाएं
साथियों
साम्प्रदायिक सद्भाव मिटाना
इंसानियत के लिए ठीक नहीं !
@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

शुक्रवार, 23 अक्तूबर 2015

विकलांगता

हैदराबाद स्थित बिरला निर्मित वेंकटेश्वर मंदिर के निकट इस साधु वेश विकलांग भिखारी पर जब मेरी नजर पड़ी, तो उसके पीछे खड़ी महिला की गतिविधियो की तरफ भी ध्यान गया| वह श्रद्धालुओं से   मिले सिक्के और नोट बटोर कर पास में चिलम पीते बैठे व्यक्ति को सौंप रही थी| विकलांग भिखारी से वस्तुस्थिति पूछने पर उसने बताया कि चीलम पीते व्यक्ति और इस महिला ने उसे दैनिक वेतन पर अनुबंधित किया हुआ है| दो वक्त की रोटी भी देते है| इस इलाके में अधिकतर भिखारी भाड़े पर बैठाये गए हैं| कुछ ढोंगी अपाहिज भिखारी भी है| कुछ अनाथ बच्चों से भी भीख मंगवाई जाती है| हर गिरोह का इलाका बंटा हुआ है|
यह हालात जानने के बाद चंद पंक्तियाँ लिपिबद्ध हो गई|
विकलांगता
.............
विकलांगता
शरीर में नहीं
सोच में होती है
शोषण
करते है हर हालात में
नहीं इसकी कोई सीमा
शोषक
भुनाते हैं हर स्थिति को
नहीं इनका कोई धर्म ईमान
नहीं कोई नाता मानवता से
रौंदते है बेबस बचपन को
खून चूसते हैं विवशता का
धन पशु बन कर ये जीते हैं
शोषक लोभवश स्वयं को
ज़िंदा रह कर मुर्दा बना लेते
कब्र पर भी दूकान सजाते है
अंततः
बेमौत मिट्टी में मिल जाते है !
@ दिनेश ठक्कर बापा

गुरुवार, 22 अक्तूबर 2015

कटु सत्य
.............
रावण का अहंकार
और
असत्य
दम तोड़ देता है
उसके मरने के साथ

अहंकार और असत्य
पैदा होने के साथ
व्यक्ति
रावण बन जाता है
और
उसका पतन
निश्चित हो जाता है
जीवित रह कर भी वह
मुर्दा हो जाता है !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र गूगल से साभार)

बुधवार, 21 अक्तूबर 2015

हैदराबाद की प्रदूषित हुसैन सागर झील

चार मीनार की तरह हुसैन सागर झील भी हैदराबाद (तेलंगाना) की पहचान को रेखांकित करती है| यह कृत्रिम झील है, जो वर्ष 1562 में में मूसी नदी की सहायक नदी पर निर्मित की गई थी| इस झील की अधिकतम लंबाई करीब 3.2 कि.मी. और चौड़ाई करीब 2.8.कि.मी. है| इसकी अधिकतम गहराई 32 फुट है| यह झील हैदराबाद और इसके जुड़वा शहर सिकंदराबाद को विभाजित करती है| इस झील की शोभा बढ़ाने के लिए  वर्ष 1992 में मध्य भाग स्थित टापू पर गौतम बुद्ध की ऊंची प्रतिमा स्थापित की गई थी| इस झील के चारों ओर पर्यटन और धार्मिक स्थल भी हैं, जो इसके आकर्षण में वृद्धि करते हैं| मसलन,जल विहार, लुम्बिनी गार्डन, एनटीआर गार्डन, स्नो वर्ल्ड, नेकलेस रोड, बिरला निर्मित संग्रहालय,मंदिर आदि| लेकिन दुःख का विषय यह है कि झील पिछले तीन दशक से निरंतर प्रदूषित हो रही है| इसका पानी बेहद प्रदूषित हो गया है| आसपास के आवासीय और औद्योगिक क्षेत्र का प्रदूषित जल इस झील में प्रवाहित किया जा रहा है| शासन प्रशासन द्वारा प्रदूषण पर अंकुश लगाने अब तक कोई ठोस उपाय नहीं किये गये हैं| और न ही सामाजिक संस्थाओं द्वारा भी इस दिशा में कोई सकारात्मक पहल की जा रही है| गौरतलब है कि हैदराबाद और सिकंदराबाद के लोगों द्वारा इस झील में ही हर वर्ष हजारों की संख्या में छोटी बड़ी गणेश और दुर्गा प्रतिमाएं भी विसर्जित की जाती है| इस दौरान पूरा  महानगर उमड़ पड़ता है| इससे चारों और गन्दगी पसर जाती है| मोदी जी का स्वच्छ भारत अभियान यहां नजर नहीं आता| साफ़ सफाई राम भरोसे है|
@ दिनेश ठक्कर बापा

रविवार, 11 अक्तूबर 2015

रामोजी फिल्म सिटी में एक दिन

हैदराबाद से 25 किलोमीटर दूर नल्गोंडा मार्ग पर स्थित रामोजी फिल्म सिटी का अवलोकन यादगार रहा| दक्षिण भारत के विख्यात फिल्म निर्माता और मीडिया ग्रुप संचालक रामोजी राव ने वर्ष 1996 में इसकी स्थापना की थी| दो हजार एकड़ से भी अधिक क्षेत्रफल में विस्तृत इस आउटडोर इनडोर फिल्म सिटी में पचास शूटिंग फ्लोर हैं| यहां एक साथ पच्चीस फिल्मों की शूटिंग संभव है| प्री प्रोडक्शन से लेकर पोस्ट प्रोडक्शन तक सभी आधुनिक उपकरण,साधन सुविधाएँ उपलब्ध हैं| यहां पांच सौ से अधिक सेट लोकेशन हैं| एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन, सेन्ट्रल जेल, गाँव शहर के लोकेशन वाले विविध स्थाई सेट,चीन, यूरोप और देश के प्रमुख शहरों के बगीचों की अनुभूति कराने वाले गार्डन आदि मनमोहक हैं| रामोजी ग्रुप की इकाई उषा किरण मूवीज़ लिमिटेड ने हॉलीवुड की तर्ज पर इस फ़िल्म सिटी को साकार किया है| गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज यह विश्व का सबसे बड़ा फ़िल्म स्टुडियो कॉम्पलेक्स माना जाता है| पर्यटन स्थल बतौर भी विकसित होने के कारण यहां हर वर्ष दस लाख से भी अधिक लोग आते हैं| गाइड के नेतृत्व में रेड विंटेज बस से फ़िल्म सिटी का भ्रमण आनंददायक और ज्ञानवर्धक होता है| एक्शन थियेटर, फ़िल्मी दुनिया, बोरासुरा मैजिशियन वर्कशॉप, बर्ड पार्क, यूरेका, स्प्रीट ऑफ रामोजी,फोर्ट फ्रंटियर स्टंट शो, लाइट कैमरा एक्शन, दादाजी लाइव टीवी शो, नृत्य प्रस्तुति सहित विविध राइड पर्यटकों को लुभाते हैं| लेकिन फिल्मों की शूटिंग के दरम्यान सेट पर पर्यटकों के जाने पर सख्त मनाही है| उसके बावजूद हर पर्यटक भ्रमण के बाद सुखद अनुभूति के साथ लौटता है|
_ दिनेश ठक्कर बापा

शुक्रवार, 14 अगस्त 2015

पाखंडी मुखौटे पहने हैं

पाखंडी मुखौटे पहने हैं
अधर्मी कृत्य कर
धर्म ध्वज फहरा रहे हैं
चरित्र कलंकित कर
चेहरा चमका रहे हैं
चालचलन बिगाड़ कर
आस्था का चोला ओढ़े हैं
डमरू बजा कर
रास लीला रचा रहे हैं
बांसुरी की तान छेड़ कर
तांडव मचा रहे हैं
त्रिशूल थाम कर
राधे राधे आलाप रहे हैं
औंधे मुंह गिरने पर
हर हर गंगे जाप रहे हैं
हमें मुखर होकर
उनका मुखौटा उतारना है
हमें अलख जगा कर
उनका गोरखधंधा बंद कराना है
हमें सच्चाई की राह पर चल कर
उनको सलाखों के पीछे पहुंचाना है

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र : गूगल से साभार)

गुरुवार, 13 अगस्त 2015

भूखे इंसानों के बनाए देवी देवता

दो वक्त की रोटी की चाहत में
बस्ती के मुहाने पर
सड़क के किनारे तंबू लगा कर
भूखे इंसानों का परिवार
पत्थरों को तराश कर
ईमानदारी से गढ़ रहा है
देवी देवताओं का परिवार
उनकी छेनी हथौड़ी का प्रहार
आस्था को दे रहा है आकार
बेबस अशक्त और निर्धन हाथ
बेजान पत्थरों में प्राण फूंक कर
रच रहे शक्ति और धन की देवी
अन्न संकट से जूझ रही काया
रच रही संकट मोचन की काया
जमाने की दुत्कार झेलता हुनर
पत्थरों को दे रहा पूज्य आकार

भूखे इंसानों के बनाए देवी देवता
बिकने के लिए हो गए हैं तैयार
सज गए हैं वे सड़क के किनारे
रोजी रोटी मिलेगी इनके सहारे
इनकी कोई कीमत तय नहीं है
मोलभाव से ही इन्हें बिकना है
पिपासु क्रेता की पारखी नजर
देवी देवताओं का करेंगी उद्धार
जिनकी होगी भव्य प्राण प्रतिष्ठा
उनकी बढ़ेगी भक्तजनों में निष्ठा
जल्द बिक गए ऊंचे दाम पर
चमक दमक वाले देवी देवता
देर से बिके औने पौने दाम पर
सादे रूप रंग वाले देवी देवता
बिके बिना धरे रहे सड़क पर
ज्ञान और बुद्धि के देवी देवता

उधर, तंबू के पीछे आश्रम में
उच्च तकनीक से हुए हैं तैयार
अत्याधुनिक देवी और देवता
आशाओं के ये बाबा बापू माता
नाच कर इन्हें रिझाना आता
भक्तों को गोद में बैठ-बिठा कर
झप्पी देकर चूना लगाना भाता
सभा में कृपा की कर रहे बौछार
कचौड़ी पकौड़ी चटनी खिला कर
दिव्य शक्ति का सपना दिखा कर
दुख भरे दिन बीतने का दावा कर
भक्तों की जेब पर डाल रहे हैं डाका
लूटखसोट का छोड़ते नहीं हैं मौका

तंबू के सामने जब गुजरा काफिला
तब भूखे इंसानों का परिवार
रथारूढ़ देवी देवताओं को देख कर
दुबक गया एक किनारे
पाखंडियों का प्रपंच देख कर
दुखी हो गया शिल्पकार परिवार
मासूम बेटी ने पिता से पूछा -
इन देवी देवताओं को किसने बनाया
ये तो पत्थर के नहीं हैं ?
पिता ने रूंधे स्वर में जवाब दिया -
इन्हें अंधभक्तों ने बनाया है
इनका ह्रदय पत्थर का है !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र : गूगल से साभार)






 

 


 

 


सोमवार, 10 अगस्त 2015

टोपीधर भुजंगराज

लोकतंत्र के चंदन वन से कूच कर
टोपीधर भुजंगराज
अंध भक्तों की बस्ती में आ गए हैं
वे फन उठाए हुए हैं
उन्हें तुमसे
तुम्हें उनसे
परस्पर खतरा है
उन्होंने खतरा भांप लिया है
तुम्हें भी ज्ञान चक्षु खोलना होगा
उनसे ज्यादा सतर्क रहना होगा
तुम्हें भी अब सिर उठाना होगा
हाथ जोड़ना
फूल चढ़ाना
दूध पिलाना
बीन बजाना
मिथकीय मूर्खता बंद करना होगा
अंध विश्वास छोड़ना होगा
अन्यथा डंस लिए जाओगे
उनके जहर की मारकता समझना
अपने खून को नीला न होने देना
जिंदा इंसान की तरह ही जीना  
अपने सोए जमीर को जगाओ
भीतर की आग को बाहर लाओ
फिर तुम देखना
जन आक्रोश की आग से डर कर
डराने वाले फन समेट कर
कैसे सरपट भाग कर
चूहे के बिल में छिप जाएंगे
टोपीधर भुजंगराज !

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र : गूगल से साभार)







रविवार, 2 अगस्त 2015

सफेदपोश

सफेदपोश अपने चेहरे में
सभी कालिख छिपा लेते
सफेद उजले परिधानों में
काले कारनामे ढक लेते
काली करतूतों की देह में
बेईमानी की दुर्गंध दबा लेते  
अमीरी की नकली सुगंध से
गरीबी की नाक में दम करते
काले धन से भरी तिजोरी में
ईमान और शर्म भी रख देते
संरक्षकों की कृपा के फेर में  
सुरा-सुंदरी भी मुहैया कराते
मद्य निषेध और बेटी बचाने  
छलावा मात्र सदैव आगे रहते

राक्षसी प्रवृत्ति से धनी बन कर
दैविक कार्यों का दिखावा करते
समाज की आंखों में धूल झोंकते
अपने काले धन को सफेद करने
सामजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि करने    
आड़े तिरछे हर हथकंडे अपनाते
मर्यादा की लक्ष्मण रेखा लांघते
कोई कसर वे बाकी नहीं रखते
प्रपंच के सभी सफेदपोश नुसखे  
इनके काले धंधे से ही निकले है  

सफेदपोशों के मुखौटे उतारने होंगे
असली चेहरे अनावृत्त करने होंगे
इनके काले धंधे उजागर करने होंगे
समय रहते इनके कुचक्र रोकने होंगे

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र : गूगल से साभार)

शुक्रवार, 29 मई 2015

जंगल के बूढ़े राजा के दिन फिरे

अशक्त हुए शातिर बूढ़े शेर ने
समय की नजाकत देखते हुए
जंगल पर राज कायम रखने
अब बदल दिए हैं अपने पैंतरे
समय रहते भांप लिए हैं खतरे
बदले हैं जंगल के कानून पुराने
बिना शिकार गोश्त मिलता रहे
मांद में बैठ कर भूख मिटती रहे
भेड़ियों को बना लिया है शागिर्द
गुर्गों को दिए हैं शिकार अधिकार
सिखा दिए हैं शिकार के कई गुर

प्रतिनिधि भेड़िये विचरते हैं अब
भेड़ों के झुण्ड में शामिल होकर
गच्चा देने अपना ली उनकी चाल
भरोसा जीत लिया साथी बन कर
खुश किया है नरम घास खिलाकर
खुद भी घास खाते अपच होता जब
भेड़-झुण्ड आदी हुआ नमक खाकर
नमकीन जमीन मुहैया हो गई अब
आकर्षित करती नमक की नांदें अब
नमक चाटने भटकना न पड़ता अब
भेड़ों का खून लजीज हो गया है अब
भूख भी जिंदा रखने सफल हुए अब
मांसल बना दिया है नमक चटा कर
भेड़ियों को नमक सहज मिलेगा अब  
भेड़ों के ही खून-गोश्त से मिलेगा अब
भेड़ों ने समझी नहीं भेड़ियों की चाल
निर्भय रहे उनके खूनी पंजे देख कर
सहमे नहीं नुकीले दांत भी देख कर
भेड़चाल वाले झुण्ड ने नहीं सोचा तब
अनदेखी कभी आएगी मौत बन कर

इधर, समर्थक सियारों का "हुआ हुआ"
भेड़ियों के पक्ष में तेज हो गया है अब
जंगल जंगल यह कोलाहल तेज हुआ
अंधे-गूंगे भेड़ों के कान पक गए अब
भेड़ियों के लिए शिकार आसान हुआ
बेबस भेड़ों के सामने मौत खड़ी है अब
छोटा होता जा रहा भेड़ों का झुण्ड अब

उधर, बूढ़े शेर को भी गोश्त मिल रहा अब
बैठे बैठे शिकार में हिस्सा पहुंच रहा अब
खुद भी खा रहें हैं, दूसरों को भी खाने दे रहे      
भेड़ियों का खेमा बढ़ाने पूरा जोर लगा रहे
जंगल के बूढ़े राजा के दिन फिर गए है अब

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र : गूगल से साभार)





सोमवार, 25 मई 2015

जिंदा इंसान की तरह जीना होगा

शोषण के कुचक्र में फंसा जीवन
आखिर हम क्यों जियें
इसे हम कतई बर्दाश्त न करें
अपने सोये जमीर को जगाना होगा
स्वाभिमान से समझौता नहीं करें
संघर्ष का रास्ता हमें अपनाना होगा
शोषण के खिलाफ आवाज बुलंद करें
आक्रोश की मशाल को जलाना होगा
खुद्दारी का चूल्हा खुद प्रज्ज्वलित करें
रोटी पर अपना भी हक जताना होगा

सोद्देश्य, सार्थक, सम्मानित जीवन
हमें भी जीना होगा, हम जरूर जियें
प्रताड़ना और बेबसी के साथ न जियें
भूख के कारण मरना मंजूर न करें
पेट पर पड़ने वाली लात चिंहित करें
समय पर उन्हें सबक सिखाना होगा
लक्ष्य ऊंचा हो तो शोषण खत्म होगा

आओ, हम संघर्ष पथ पर प्रस्थान करें
जुमलेबाजों के झूठे सपनों का जीवन
आखिर हम क्यों जियें
इसे हम हरगिज स्वीकार न करें
मौलिक अधिकार के साथ जीना होगा  
जिंदा इंसान की तरह जीना होगा  

@ दिनेश ठक्कर बापा
(चित्र : गूगल से साभार)