अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

नहीं पिघलती है बर्फ कच्ची छतों में

















रात भर बर्फ अपनी ठंडी हथेलियों से
दरवाजे खिड़कियां खटखटाती है
भीतर घुसने का प्रयास व्यर्थ होने से
नींद के मारे पक्की छतों पर सो जाती है

बादलों की ओट में सूरज छिप जाने से
बर्फ दिन में भी सर्द खर्राटे मारती है
मखमली छतों की शोभा बढ़ाती है
धनी छतों को स्वर्ग सा आनंद देती है  

यदा कदा बर्फ रात को घुप्प अँधेरे में
निर्धन छतों में दबे पाँव पहुँच जाती है  
जीवन रोशनी बुझाने में खुश होती है
नहीं पिघलती है बर्फ कच्ची छतों में

पहाड़ पर बर्फ सफेद कहर बरपाती है  
निर्बल छतें ही खून से लथपथ होती हैं  
जमीन से लिपट कर दम तोड़ देती है  
बर्फ की चादर ही कफन बन जाती है      
 
@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(तस्वीर मेरे द्वारा)  


एक टिप्पणी भेजें