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सोमवार, 29 दिसंबर 2014

पश्मीना ओढ़ा बूढ़ा पेड़

जवां चीड़ देवदारों के बीच
जीवन के अंतिम छोर पर
झुका पश्मीना ओढ़ा बूढ़ा पेड़
भारी बर्फबारी से शंकित है
आ न जाय गिरने की बारी
अनुभवी आँखों में नमी सी है
पड़ोसी पेड़ों से विनती करता है
मुझे अपनी जड़ों से जोड़े रखो
ठंडी होती देह को गरमाए रखो
आशाओं का अलाव जला दो
बुझते संबंधों को सुलगा दो
मेरी शाखों को ईंधन बना लो
तुम सूखे स्वार्थी पत्ते जला दो
सफेद आफत को राख कर दो
हम ऐसी ऊर्जा पैदा करें ताकि  
देह प्रेम अग्नि से गर्म हो जाय  
बर्फ भी पसीने पसीने हो जाय      

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
 (तस्वीर मेरे द्वारा)





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