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शनिवार, 13 दिसंबर 2014

मुखौटा

परदा जब गिरता है
जीवन के रंगमंच का
तब दुखी हो जाता हैं
मुखौटा
देख कर असली चेहरा
अपने ही किरदार का
फिर भाव विहीन होकर
मुखौटा
निष्प्राण देह को तज कर
आशाओं की साँस के साथ
नया किरदार ढूंढ लेता है
मुखौटा
बार बार किरदार ढूंढता है
मुखौटा
किंतु सदैव निराश होता है
मुखौटा
तलाश में अब बूढ़ा हो गया है
मुखौटा
किरदार संग बेजान हो गया है  
मुखौटा  
@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(चित्र गूगल से साभार)   

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