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बुधवार, 10 दिसंबर 2014

दाम्पत्य जीवन

दंभ परे रख कर
जीना पड़ता है
दाम्पत्य जीवन
बनना होता है
परस्पर पूरक
रहना होता है
एकाकार होकर
तभी निभता है
दाम्पत्य जीवन

सुख दुख दो ऋतुएं हैं
दाम्पत्य जीवन की
समन्वय आवश्यक है
ऋतु परिवर्तन में
पतझड़ और बहार
आपसी परीक्षा लेते हैं
दाम्पत्य जीवन की
समझौता और जिम्मेवारी
पुष्पित करती है बगिया
दाम्पत्य जीवन की
फिर महकते हैं
समर्पण के फूल

इन्हीं सिद्धांतों के जल से
मेरे माता पिता ने भी
पुष्पित की थी बगिया
दाम्पत्य जीवन की
मैंने भी सिंचित की है
विरासत के जल से बगिया
दाम्पत्य जीवन की
किंतु समर्पण के फूल महके हैं
संगिनी के निःस्वार्थ सिंचन से
इसीलिए पुष्पित पल्लवित है
हमारा दाम्पत्य जीवन

@ दिनेश ठक्कर "बापा"




 



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