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शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

रावण लीला

यह कलयुग है प्यारे
स्वार्थ सिद्धि के लिए
अब राम का मुखौटा
रावण लगाते हैं सारे
हनुमान को साथ लिए
रहते हैं वे बीच हमारे
लक्ष्मण को संग लिए
राम के वेश में हैं प्यारे
कौन राम है कौन रावण
यह पहचानना कठिन है
मुखौटे में छिपते हुए
सबको भ्रमित करते हैं
ये कलयुगी पात्र हैं प्यारे
राम लीला दिखाते हुए
रावणपन से छलते हैं
बंद कमरे में एक रहते हैं
लक्ष्मण रेखा लांघते हुए
अब लक्ष्मी हरण करते हैं
संकट को सामने देखते हुए
अपनी लंका स्वयं जलाते हैं
रावण का पुतला जलाते हुए
नए दशानन को खड़ा करते हैं
और शान से दशहरा मनाते हैं

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
     (सांकेतिक चित्र :गूगल से साभार)
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