अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

शुक्रवार, 10 अक्तूबर 2014

जग जीत कर कहां चले गए

जग जीत कर कहां चले गए
चिट्ठी संदेश मायूस लौट आए
देश राग को क्यों रूला गए
गीत भी आंसुओं से भीग गए

जाते जाते कैसा राग छेड़ गए
सुर ताल से साथ छोड़ गए
हर साज को थे तुमने सजाए
इनसे हाथ जल्दी क्यों छुड़ा गए
जग जीत कर कहां चले गए

चाहने वालों को क्यों तड़पा गए
संगी संगीत को अब चैन न आए
गजल को तेरा ही गम सताए
अंखियों को अब नींद न आए
जग जीत कर कहां चले गए

सरगम भी गम से तनहा हो गए
सारे गम तुम्हारे अब हमारे हो गए
कागज की कश्ती किनारे कर गए
बारिश का पानी आंसू बना गए
जग जीत कर कहां चले गए

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
(10 अक्टूबर 2011 को सुबह मुम्बई में प्रख्यात गजल गायक जगजीत सिंह का निधन होने पर श्रद्धांजलि स्वरूप मैंने यह गीत लिखा था, जो दैनिक भास्कर, बिलासपुर में 11 अक्टूबर 2011 को छपा था )
(ब्लॉग में इस्तेमाल चित्र गूगल से साभार)
   
एक टिप्पणी भेजें