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शुक्रवार, 3 अक्तूबर 2014

राम भरोसे है राम लीला

मुम्बई में सांध्यकालीन हिन्दी दैनिक अखबारों की श्रृंखला में इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र समूह के "संझा जनसत्ता" का स्थान प्रमुख माना जाता था। मुम्बई में पत्रकारिता करने के दौरान इस समाचार पत्र समूह से जुड़ कर मुझे लेखन कार्य का निरंतर अवसर प्राप्त हुआ था। "संझा जनसत्ता" के 3 अक्टूबर 1997 के अंक में "मुम्बई में रामभरोसे है राम लीला" शीर्षक से मेरी रिपोर्ताज प्रकाशित हुई थी। यह रिपोर्ताज आज भी मुझे सामयिक और प्रासंगिक लगती है। आर्थिक तंगी से पीड़ित राम लीला मंडलियों की हालत कमोवेश आज भी ऐसी ही है। आधुनिक और बदलते परिवेश के कारण न सिर्फ मुम्बई बल्कि देश के अन्य हिस्सों में भी पारम्परिक "राम लीला" के मंचन पर असर पड़ा है। इस लोक परम्परा को बचाए रखने आज भी जो मंडलियां सक्रिय हैं और जो आयोजक राम लीला का मंचन करा रहे हैं, वे भी बधाई के पात्र हैं।    
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                                ( दिनेश ठक्कर )
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन चरित्र और उनके आदर्शों की
जीवंत झांकी प्रस्तुत करती हैं राम लीला। यूं तो देश के विभिन्न प्रांतों में इसके मंचन की शैली और उसका प्रस्तुतीकरण भिन्न होता है, लेकिन उसका मूल भाव एक समान रहता है। राम लीला का मुख्य आधार वैसे तो रामचरित मानस ही है, लेकिन कई मंडलियां अन्य आधार ग्रंथों का सहारा लेती है। इसलिए भाषा में भी विभिन्नता पाई जाती है। खड़ी बोली, अवधी, भोजपुरी आदि इसकी संप्रेषक बोली होती है। मुंबई जैसे आधुनिक महानगर में भी राम लीला का गौरवशाली इतिहास रहा है। यहां वृंदावन, मथुरा, मुरादाबाद की व्यावसायिक मंडलियां एक लंबे अरसे से राम भक्तों को आकर्षित कर रही हैं। तो दूसरी ओर स्थानीय और गैर व्यावसायिक मंडलियां भी मुंबई के आधुनिक माहौल को राममय बनाने में अपनी अहम भूमिका अदा कर रही हैं।
मुंबई और आसपास के उप नगरों में राम लीला आम तौर पर दो चरणों में आयोजित होती है। एक दशहरा से पूर्व और दूसरी उसके बाद। दशहरा के बाद बोरीवली और वडाला की राम लीला बेहद प्रसिद्ध है। नवरात्रि से शुरू होने वाली राम लीलाओं की संख्या इस वर्ष तकरीबन चालीस है। इनमें आठ- दस राम लीला का मंचन पूरी साज-सज्जा और भव्यता के साथ किया जाता है। मुंबई में सार्वजनिक राम लीला के जनक पं. शोभनाथ मिश्र माने जाते हैं। यद्यपि वर्ष 1964 के पहले राम लीला का स्वरूप छोटा हुआ करता था। उनके दर्शक उसी मुहल्ले के ही होते थे। वर्ष 1961 में आजाद मैदान में हुई राम लीला का भी उस समय काफी अर्थ हुआ करता था। तब इसे सिने कलाकारों द्वारा पेश किया गया था, लेकिन दर्शकों में इनकी लीला लोकप्रिय नहीं हो सकी। इसलिए अगले दो- तीन वर्षों में इसका आयोजन बंद हो गया।
पंजीकृत समितियों की देखरेख में होने वाली राम लीला की असल शुरुआत वर्ष 1953 में हुई थी। तब इसके आयोजन का जिम्मा पं. शोभनाथ मिश्र को सौंपा गया था। यद्यपि इसके पहले भी सांस्कृतिक मंच पर व्यावसायिक राम लीला होती थी। इसे प्रस्तुत करने उत्तर प्रदेश और बिहार की कुछ मंडलियां मुंबई आया करती थीं। हालांकि यहां आने से उन्हें कोई खास आर्थिक फायदा नहीं हो पाता था। केवल आरती के चढ़ावे से उन्हें संतुष्ट रहना पड़ता था। रोज के भोजन की व्यवस्था भक्तगण कर दिया करते थे। इन सब दिक्कतों के कारण यह क्रम भी बाधित हुआ। पं. शोभानाथ मिश्र उत्साही थे। वे राम भक्तों के लिए स्थाई आयोजन का स्वप्न देखा करते थे। उत्तर भारतीयों को बेहतर धार्मिक माहौल भी वे देना चाहते थे। इसलिए उन्होंने फोर्ट में राम लीला समिति का गठन किया। इसके तहत उन्होंने राम लीला का आयोजन शुरू करवाया। पं. मिश्र के अच्छे संपर्क और संबंधों के कारण नामी हस्तियां भी इस समिति से जुड़ीं और फिर एक निर्बाध सिलसिला चल पड़ा राम लीला के आयोजन का।
73 वर्ष पहले जूना खार के हनुमान मंदिर का राम लीला महोत्सव भी यादगार हुआ करता था। भले ही इसका स्वरूप छोटा था। महावीर दास के संचालन में महोत्सव की शुरुआत हुई थी। अब इनके पौत्र शिवमूर्ति दास इस क्रम को अपने स्तर पर आगे बढ़ा रहे हैं। हालांकि इनकी समिति बड़ी नहीं हैं। सहयोग के बलबूते आयोजन किया जाता है।
मुंबई में भव्य राम लीला के आयोजन में श्री आदर्श राम लीला समिति का महत्वपूर्ण योगदान है। वर्ष 1964 में इस समिति की स्थापना हुई थी। तब अलग- अलग क्षेत्र में राम लीला के आयोजन का निर्णय लिया गया था। अखंडानंद सरस्वती की प्रेरणा से ही श्री राम लीला समिति का नाम परिवर्तित कर श्री आदर्श राम लीला समिति किया गया था। एम.बी. जयकर, विनोद गुप्ता, जुग्गीलाल पोद्दार, जुगू किशोर बंसल, रमेश ब्रजवासी इसके प्रमुख संस्थापक थे। एम.बी. जयकर संस्थापक अध्यक्ष रहे, जबकि शिवकुमार भुवालका और पं. शोभनाथ मिश्र उपाध्यक्ष हुए थे। जयकर जी के बाद शिवकुमार भुवालका को समिति का अध्यक्ष बनाया गया। वर्ष 1969 में उनके निधन के बाद रामप्रसाद पोद्दार वर्ष 1974 तक अध्यक्ष रहे। वर्ष 1974 से 1987 तक सदाजीवत लाल चंदूलाल बहल का नेतृत्व रहा। इनके निधन के बाद 1987 में दौलतराम भेरूमल पहलाजानी अध्यक्ष बने। वर्तमान में इसके अध्यक्ष दौलतराम और मंत्री स्वरूपचंद गोयल और राजेंद्र अग्रवाल हैं। इस समिति द्वारा समय के हिसाब से राम लीला के आयोजन का स्थल भी बदला जाता रहा। वर्ष 1964 में आजाद मैदान, 1965 में क्रास मैदान ,1968 से 1970 तक फिर से आजाद मैदान, 1971 से फिर क्रास मैदान, 1972 से क्रास मैदान के बदले चौपाटी में राम लीला का आयोजन होता रहा। शिवाजी पार्क दादर में राम लीला वर्ष 1969 से शुरू हुई थी। 1972 से काटनग्रीन और 1977 से वडाला में दशहरा के बाद राम लीला हो रही है। 1976 से चेंबूर में भी राम लीला शुरू हुई थी, जो बाद में बंद कर दी गई। 1982 में श्री आदर्श राम लीला समिति ने वडाला की राम लीला बंद कर बोरीवली में राम लीला की शुरुआत की। 1964 में जब इस समिति ने राम लीला की शुरुआत की थी तब उसका खर्च मात्र 35 हजार रूपए होता था, जो अब बढ़ कर 5 लाख रूपए से भी ज्यादा हो गया है। डांडिया रास के आयोजन की तरह इसके बड़े प्रायोजक और विज्ञापनदाता नहीं मिल पाते हैं।
श्री आदर्श राम लीला समिति के अलावा अन्य बड़ी राम लीला समिति भी हर वर्ष सरकारी उपेक्षा को लेकर दुखी रहती है। मैदान के आबंटन, उसकी अनुमति, बिजली की दर, उसकी अग्रिम जमा राशि, पानी की दर आदि को लेकर समितियों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती है। इस वर्ष सबसे ज्यादा तकलीफ श्री आदर्श राम लीला समिति को हुई। इनके दादर स्थित शिवाजी पार्क की राम लीला को आयोजन दिवस के मात्र एक दिन पहले लिखित रूप से मैदान की अनुमति मिली। समिति के मंत्री स्वरूपचंद गोयल ने बताया कि आयोजन में दो दिन पहले सरकारी अमला धमकी देकर गया था कि यदि लिखित अनुमति नहीं होगी तो उनके मंच और पंडाल को तोड़ दिया जाएगा। राज्य मंत्री राजपुरोहित की सक्रियता के कारण हालांकि मामला सुलट गया। श्री गोयल ने बताया कि बिजली की दर में भी एकरूपता नहीं रहती है। अग्रिम जमा राशि कई दफा एक वर्ष बाद भी वापस नहीं की जाती है। हिंदू मतों की राजनीति करने वाले बाल ठाकरे और मनोहर जोशी का रवैया राम लीला के प्रति कतई सम्मानजनक और सहयोगात्मक नहीं है। जब बाल ठाकरे विपक्ष में थे तब वे बिना बुलाए लीला महोत्सव में आकर लोगों को आश्वस्त करते थे कि उन्हें कोई तकलीफ नहीं होने दी जाएगी और न ही समय की पाबंदी से डरने की जरूरत है। अब जब उनकी पार्टी सत्ता में है तो सबसे ज्यादा तकलीफ ये ही लोग दे रहे है। इस वर्ष भी रात साढ़े ग्यारह बजे तक लाऊड स्पीकर चालू रखने का आदेश दिया गया है। इसके कारण आगे की लीला प्रभावित होने का अंदेशा है। इसी तरह के आदेश के कारण पिछले साल भी पुलिस से झड़पें हुआ करती थीं।
हालांकि राम लीला समितियों की समस्याओं के निदान के नाम पर राम लीला महासंघ का गठन वर्ष 1990 में किया गया था। राममनोहर त्रिपाठी की प्रेरणा से इसकी स्थापना हुई थी। स्व. रामनाथ गोयनका और विनोद गुप्ता ने इसकी स्थापना में हर दृष्टि से बेहद सहयोग किया था। इस महासंघ के वर्तमान में 16 राम लीला समिति के लोग सदस्य हैं। भालचंद्र दिघे इसके अध्यक्ष और राजेंद्र अग्रवाल मानद मंत्री हैं। यह महासंघ अपने उद्देश्यों को लेकर काफी हद तक सफल है।
मुंबई की राम लीला समितियों के क्रियाकलापों और मंडलियों के कलाकारों की सोच और स्थितियों के कारण राम लीला का स्वरूप भी अब बदला है। श्री आदर्श राम लीला समिति द्वारा चौपाटी और शिवाजी पार्क में की जाने वाली राम लीला सजावाट और भव्यता के मामले में अग्रणी कही जाएगी। इनके आयोजकों का मानना है कि जब तक राम लीला में मर्यादा के तहत आकर्षण नहीं होगा तब तक दर्शकों में इसका आकर्षण भी नहीं बढ़ेगा। समय के साथ जरूर इसका स्वरूप कुछ बदला है, लेकिन इसका मूल आधार बिलकुल परिवर्तित नहीं हुआ है। श्री राम लीला सेवा केंद्र (क्रास मैदान धोबी तालाब), साहित्य कला मंच (आजाद मैदान), श्री रामायण प्रचार समिति (जुहू), महाराष्ट्र राम लीला मंडल (आजाद मैदान), राम लीला प्रचार समिति (मालाड़) आदि के लोगों का भी यही मानना है कि राम लीला में अन्य लीला की तरह आमूलचूल परिवर्तन नहीं हुआ है। अभी भी उसका लोक और धार्मिक तत्व बरकरार है।
राम लीला प्रस्तुत करने वाली मंडलियों की माली हालत हालांकि संतोषजनक नहीं है। आर्थिक तंगी के कारण कई मंडलियां बिखराव के कगार पर हैं। मथुरा, वृंदावन और मुरादाबाद से यहां आने वाली मंडली के संचालकों में इस त्रासदी का असर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। अनंत राम लीला मंडल (मथुरा) के संचालक बैजनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि सरकार से हमें जरूरत के मुताबिक सहयोग नहीं मिल पाता। मैं और मेरी मंडली के कलाकार भक्ति भावना से प्रेरित होकर ही अब तक राम लीला में हिस्सा ले रहे हैं। इससे हमें खास आर्थिक फायदा नहीं हो पाता। यही बात चतुर्वेद राम लीला मंडल (मथुरा) के संचालक वासुदेव चतुर्वेदी, स्वामी रामस्वरूप शर्मा (वृंदावन) भी कहते हैं।

(इंडियन एक्सप्रेस समाचार पत्र समूह के "संझा जनसत्ता", मुम्बई में 3 अक्टूबर 1997 को प्रकाशित)

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