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मंगलवार, 23 सितंबर 2014

परिंदे को आसमां बुलाए

परिंदे को आसमां बुलाए
उड़ जा दरख़्त बेगाने हुए
पत्ता पत्ता भी खुदगर्ज़ हुए
उड़ना होगा आज़ादी के लिए

शाख से साथ छूटता जाए
जड़ों से नाता टूटता जाए
हवा का रूख बदलता जाए
उड़ना होगा आज़ादी के लिए

बुरे वक्त में अपने हुए पराए
पर कतरने पर आमादा हुए
दाना पानी के लिए तरसाए
उड़ना होगा आज़ादी के लिए

देर न कर वक्त बीता जाए
आसमां पुकारे बांहें फैलाए
लंबी उड़ान का हौंसला लिए
उड़ना होगा आज़ादी के लिए

ज़मीं को रूख़सत करते हुए
बेमानी रिश्तों को तोड़ते हुए
बेदर्द जहां से कूच करते हुए
उड़ना होगा आज़ादी के लिए

परिंदे को अब चैन न आए  
जिंदगी के पंख फड़फड़ाए
आसमां की पुकार सताए
उड़ना होगा आज़ादी के लिए

अब वह जा रहा है हंसते हुए
देख रहा जमाने को रोते हुए
उड़ा है वह नई उम्मीदें लिए
आसमां खड़ा है फूल बिछाए

सूरज चांद सितारे भी आए
मिल कर सबने गले लगाए
जन्नत के इंद्रधनुष बनाए
खुश है वह आसमां ओढ़े हुए

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
     (चित्र : गूगल से साभार)

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