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सोमवार, 4 अगस्त 2014

सुन रहे चांद तारे अलबेले

राग रागिनियों की थी वो बेला  
उनके संग आया सुरों का रेला
पीछे छोड़ गए वे यादों का मेला
ऊपर वाले ने ये कैसा खेल खेला

आए और गए वो खुद रोते हुए
चले गए वो जग को हंसाते हुए  
जीवन की उलझन छिपाते हुए
गीतों को जीवंत किए गाते हुए

याद आते तो गाती है हर धड़कन
ह्रदय को होता सुरों पर अभिमान
सुन कर स्वस्थ हो जाता तन मन
रगों में प्रवाहित होती सुरीली तान

खिलंदड़ चहेरे ने दर्द खूब छिपाए
हाथ की लकीरों ने कई भेद दबाए
अपनों के साए भी साथ छोड़ गए
विधि के विधान को कौन पढ़ पाए

आंसुओं से सींचा खुशी का तराना
सुन कर उसे खुश होता है जमाना
महफिल में झूम उठता है दीवाना
गीतों में चाहता हर कोई खो जाना

कह रहे हैं सिसकते हर साज
तेरे बिना जीना दुश्वार है आज
उखड़ी उखड़ी सी सांसें सुरों की
तान थम सी गई है तरानों की

सरगम की उदास बगिया में
सुगंध नहीं मिलती है फूलों में
भौंरों ने छोड़ दिया है मंडराना
कलियों को न भाता है खिलना

कहीं दूर गगन की छांव में
यादों के साज की संगत में
गा रहे हैं वो अकेले अकेले
सुन रहे चांद तारे अलबेले  

उस आभासी गगन के तले
न गम मिले न आंसू निकले  
उन्हें अब प्यार प्यार ही मिले
सूरज की पहली किरण मिले

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
     (चित्र : गूगल से साभार) 

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