अभिव्यक्ति की अनुभूति / शब्दों की व्यंजना / अक्षरों का अंकन / वाक्यों का विन्यास / रचना की सार्थकता / होगी सफल जब कभी / हम झांकेंगे अपने भीतर

शनिवार, 2 अगस्त 2014

मरते नहीं हैं कभी प्रेमचंद

मरते नहीं हैं कभी
प्रेमचंद
जीवित रहते हैं सदा
प्रेमचंद
सच्चे शब्दार्थों में
निःस्वार्थ कलम में
उत्पीड़ित देह में
शोषित पात्रों में
आक्रांत बस्तियों में
सतत जागृत रखना हैं
शब्द साधकों को
प्रेमचंद
अपने सार्थक सृजन में
बोध कराना है अक्षरों में
प्रेमचंद
होने के अपने सही मायने
अभिव्यक्ति की अनुभूति
शब्दों की व्यंजना
अक्षरों का अंकन
वाक्यों का विन्यास
रचना की सार्थकता
होगी सफल जब कभी
हम झांकेंगे अपने भीतर
ह्रदय से होंगे एकाकार
प्रेमचंद की आत्मा से
तब पुनः दिखेंगे सृजन में
प्रेमचंद

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
     (चित्र : गूगल से साभार) 
एक टिप्पणी भेजें