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शनिवार, 2 अगस्त 2014

फिर कब आओगे रफी












अकेले अकेले कहां चले गए
रफी
सुरों को बेसहारा क्यों कर गए
रफी
राग रागिनियों को क्यों रूला गए
रफी
गाते सुनते आंखों में उतर आए
रफी
आंसू बन कर तुम छलक गए
रफी
छलकते आंसू भी मोती बन गए
रफी
यादें अपनी छोड़ गए गाते हुए
रफी
ढूंढ रहा है जमाना तुम्हें रोते हुए
रफी
सुर ताल प्रतीक्षारत हैं पूछते हुए
फिर कब आओगे
रफी
सरगम ने जब तुम्हारे गीत सुनाए
रफी
साज भी जब संग संग गुनगुनाए
रफी
नग़मों में अक्स तुम्हारे उभर आए
रफी
यूं भुला ना पाएंगे वक़्त के पहरुए
रफी

जब भी ख्यालों में तुम आए
रफी
मौसिक़ी में तुम ही नजर आए
रफी
वो समां हम ना भुला पाए
रफी
गायिकी को गुलज़ार कर गए
रफी
ढूंढती ग़मगीन निगाहें बुलाए
रफी
चाहने वालों को बहुत याद आए
रफी
गाने वाले दर्द में डूबे गीत गाए
रफी
साजिंदे सिसकता साज सुनाए
रफी
रोज पुरानी राहों से आवाज दिए
रफी
फिर कब आओगे
रफी

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
     (चित्र : गूगल से साभार)
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