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गुरुवार, 24 जुलाई 2014

काष्ठ रूप जगन्नाथ

दशपल्ला के अरण्य में हुआ
सूत्रपात
विप्र विद्यापति बने
सूत्रधार
नीलमाधव दर्शन उपरांत सुनी
देववाणी
काष्ठ रूप में तैरते पहुंचेंगे स्वयं
जगन्नाथ
चक्र तीर्थ सागर तट तीरे
और यही काष्ठ खण्ड होंगे
पूजित

लौटे विप्र और सुनाई गाथा
पंडुवंशीय नरेश इंद्रद्युम्न को
सच हुई घोषित पूर्णिमा पर
देववाणी
मिले सागर तट तीरे काष्ठ खंड
शंख चक्र गदा पद्म उत्कीर्ण
तीन काष्ठ
अनुष्ठान यज्ञादि पश्चात
प्रस्थित कराए जनकपुर गुंडिचा

आए बूढ़े बढ़ई के छद्म वेश में
सृष्टिकर्ता
दिया सशर्त प्रस्ताव इंद्रद्युम्न को
काष्ठ से देव विग्रह निर्माण का
व्यवधान रहित बंद कमरे में
प्रारम्भ हुआ प्रतिमा निर्माण
कुछ दिनों बाद जिज्ञाशावश
इन्द्रद्युम्न ने किया वचन भंग
खोल दिया कमरे का दरवाजा
अदृश्य था बूढ़ा बढ़ई
मिले अर्ध निर्मित तीन विग्रह
कोहनी हथेली चरण विहीन
जगन्नाथ बलभद्र और सुभद्रा
इन्हीं रूपों में होते हैं विग्रह  
पूजित
मान्यताओं के हैं ये श्रद्धा शब्दार्थ

अधूरे अंग होने के बाद भी होते हैं
पूजित
काष्ठमय जगन्नाथ
परंतु पूरे अंग पाने के बाद भी
प्राणमय व्यक्ति
दुष्कर्मों के फलीभूत होता है
लज्जित
संपूर्ण अंगों का करता नहीं है
सदुपयोग
जिंदा लाश बन कर
ढोता रहता है जिंदगी का बोझ
हाड़ मांस वाला भी बन जाता है
काष्ठमय व्यक्ति
और देह दाह होता है लकड़ियों से

@ दिनेश ठक्कर "बापा"
 (चित्र : गूगल से साभार)
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