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सोमवार, 23 जून 2014

अभिव्यक्ति पर आघात












पढ़ाई के बाद कोई काम मिला नहीं
तो कलम थाम ली
मालूम था इतना आसान नहीं
दुर्दिन को कलमना

रखना था स्याही से सरोकार
अंदेशा भी था स्याह होने का
सामने लाना था शब्दों से सच
खतरा था सुर्खियां बनने का

सुधारना था समाज वाक्यों से
जानता था असामाजिक होना
कठिन था सामाजिक व्याकरण
संबल मिला सच्ची पंक्तियों से

गलत व्यक्ति का सही चेहरा
मुखौटे से उसे अनावृत्त करना
प्रलोभन संग व्यक्तिगत होना
यह कार्य है बड़ा जोखिम भरा

आदमी को इंसान बनाना
आसान नहीं है इतना
रगों में इंसानियत का रक्त
चाहता है यह विषम वक्त  

शक्ति की अस्मत लुट जाना
निःशक्त का घर उजड़ जाना
शब्दों का निःशब्द हो जाना
दुखद है कलम का कुंद होना

अभिव्यक्ति पर आघात बढ़ना
फिर भी कलम मुखर रखना
जान हथेली पर लेकर
लिखना होगा निडर होकर

-दिनेश ठक्कर "बापा"
 (चित्र : गूगल से साभार)




 




  
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