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रविवार, 15 जून 2014

बापूजी का बनाया घर









बापूजी का बनाया घर
मेरा ही हक़ नहीं इस पर
यदा कदा सांप आ जाते
रहने का हक़ जता जाते  
आस्तिन में हैं सांप रहते
इसलिए नहीं लगता भय

रहते यहां मेंढक निर्भय
बढ़ रहा उनका परिवार
वे नहीं हैं बरसाती मेंढक
उनका व्यवहार है पृथक
टर्राना उनको न सुहाता
वे भी नहीं बनना चाहते
मेरी तरह कुएं के मेंढक
पसंद नहीं है उछलना
जमीन पर रहना भाता
   
बिल्लियों का आशियाना
मौक़ा पाते दूध पी जाना
ठंड में रजाई में दुबकना
फिर भी मनुष्यों से कम
अपनी चालाकी दिखाना
कभी अपनापन जताना
ये घर नहीं लगता बेगाना

कभी चूहे देख मुंह फेरना
अचंभित करता है याराना
चूहे बिल्ली का साथ रहना
शत्रु भाव को भी परे रखना
मनुष्यों को है शिक्षा लेना
 
बढ़ती जा रही छिपकली
दीवारें बनी ठौर ठिकाना
टंगी दीवार घड़ी की तरह
हर वक्त की याद दिलाती
कीड़े मकोड़ों को दबोचना
दबंगों सा अहसास कराती
शिकार पर नजरें गड़ाना
मौका मिलते लील जाना
दुष्टों जैसी बन गई प्रवृत्ति  
सतर्क रहने की सीख देती

ये दिन भी शेष था देखना
अब मीठा बोलने पर भी
निकल आतीं हैं चीटियां
नमक अदा करने पर भी
उमड़ पड़ती हैं चीटियां
अच्छे दिन आने पर भी
चीटियों के पर निकलना
पैदा करती कई भ्रांतियां
नियति है इनके बीच रहना
अपनी जमीन से जुड़े रहना

नहीं आसान ये दुख भुलाना
सड़क चौड़ीकरण का बहाना
घर के सामने पेड़ का कटना
चिड़ियों का बसेरा उजड़ना
न सुनना उनका चहचहाना
वे थी आनंददायक पड़ोसी
आंगन में भी होता था आना
दुखद है स्मृति शेष हो जाना

-दिनेश ठक्कर "बापा"
  (चित्र : गूगल से साभार) 
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