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शनिवार, 26 अप्रैल 2014

मुगालता

जिंदगी गुजर गई बापा
हमेशा मुगालते में रहा
सफ़ेद लिबास ओढ़े थे
किंतु मन काला ही रहा

ऊंचाई पर तो पहुंचा बापा
किंतु क़द बना रहा बौना
हमेशा की बड़ी बड़ी बातें
और सोच बनी रही छोटी

ताउम्र उछलता रहा बापा
और खुद को छलता रहा
पांव जमीं पर न रख सका
आसमां छूने का भरम रहा

जिंदगी स्वार्थ से बिताई बापा
ईमान की बंदगी न कर सका
गैरों का कंधा इस्तेमाल किया
आख़री वक्त कोई कंधा न दिया

-दिनेश ठक्कर "बापा"

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