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शनिवार, 12 अप्रैल 2014

कागद कारे

जिंदगी के कैनवास में
सिमट गई है सूरत
उभर गई है रेखाओं में
वक्त से जूझती मूरत
स्वार्थ की दीर्घा में
नहीं है इंसान की कीमत
अगर हौंसला रहे दिल में
परेशानियां हो जाएंगी पस्त
ताकत है कलम कूची में
लगेंगे कागद कारे भी मस्त

- दिनेश ठक्कर "बापा"
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