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शनिवार, 25 जनवरी 2014

अंग प्रत्यंग पर राम नाम गुदवाने वाले रामनामियों का अनूठा समागम

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के ग्राम बिनौरी (धुर्वाकारी) में आयोजित तीन दिवसीय राम-राम बड़े भजन मेला अविस्मरणीय रहा। अंग प्रत्यंग पर राम नाम गुदवाए रामनामियों के इस अनूठे संत समागम के दौरान सतनामी समाज के हजारों श्रद्धालुओं ने मत्था टेक कर पूजा अर्चना की। रामनांमियों के ह्रदय स्पर्शकारी राम धुन-भजन से समूचा माहौल राममय हो गया था। 
12 से 14 जनवरी तक ग्राम बिनौरी की हर धड़कन हरिजन रामनामियों के नाम हो गई थी। रामनामी गुरू-गोसाइयों और भक्तों के अंग-प्रत्यंग पर सुई से किया हुआ राम नाम का अंकन, सिर पर सज्जित मोर पंखी बांस मुकुट, बदन पर लिपटा राम-राम लिखित सूती शाल, पैरों में बंधे घुंघरूओं की खनक, घुंघरू मंडित काष्ठ चौकों की ध्वनि और राम-राम के कर्णप्रिय लयात्मक उच्चारण से समूचा वातावरण राममय हो गया था। एक तरफ लोक शैली के मेले का आनंद, तो दूसरी तरफ रामनामियों का संत- समागम। दोनों ही छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति और आस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं। यहां न केवल बिलासपुर बल्कि जांजगीर, कोरबा, सरगुजा, रायगढ़, रायपुर आदि जिले के भी हजारों रामनामी इकट्ठे होकर राम के प्रति अपनी आस्था प्रकट की।   
अखिल भारतीय रामनामी महा सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष फिरतराम महिलांगे ने रामनामी भजन मेला का इतिहास बताते हुए कहा कि वर्ष 1910 में चारपारा के गौंटिया ने रामनाम भजन की शुरूआत की थी। फिर धीरे धीरे रामनामियों की संख्या बढ़ते गई। इनकी संख्या अब छह लाख हो गई है। अखंड राम नाम जपने के बाद राम-राम बड़े भजन मेला की शुरूआत ग्राम तिल्दा से हुई। अब तक 104 राम-राम  बड़े भजन मेले का आयोजन हो चुका है। तिल्दा, अखिल भारतीय रामनामी महासभा का केंद्र बन चुका है। रामनामियों की खूबियों के बारे में उन्होंने बताया कि रामनामी शुद्ध शाकाहारी होते हैं। वे सत्य वचन वाले होते हैं। वे समस्त इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर शरीर के अंगों पर सुई से राम नाम का गोदना करवाते हैं। शुद्ध आचार, विचार और व्यवहार से राम नाम निरंतर जपते हैं। इससे जो सुख उन्हें मिलता है, वह अतुलनीय है। ऐसा सुख उन्हें और कहीं नहीं मिलता है। राम नाम का गोदना उनकी असल पहचान है। इसे देख कर लोग सहज ही राम राम कहते हैं। सतनामी हरिजन समाज की नई पीढ़ी शरीर पर अब राम नाम गुदवाने से परहेज क्यों करने लगी है? इसके जवाब में उन्होंने कहा कि पीढ़ियों का अंतर आने और बदलते वक्त के कारण राम नाम गुदवाना बंद नहीं हुआ है, लेकिन कम जरूर हो गया है। पहले दस लोग राम नाम गुदवाते थे, अब दो लोग गुदवाते हैं। इसके बावजूद रामनामी पंथ से सरोकार और आस्था कम नहीं हुई है। हम रामनामी भजन बैठक-मेले में समाज के लोगों को शराब आदि व्यसन से दूर रहने प्रेरित करते हैं। साफ सुथरा जीवन जीने कहते हैं। बच्चों को शिक्षित करने पर जोर देते हैं। धार्मिक के साथ साथ सामाजिक कर्तव्य भी हम निभाते हैं।  
अनैतिक कार्य करने वालों को दी जाती है कड़ी सजा 
मेला समिति के अध्यक्ष राजेन्द्र धृतलहरे ने बताया कि इस राम राम बड़े भजन मेले में धार्मिक पक्ष के अलावा सिनेमा, सर्कस, झूले आदि मनोरंजन साधनों के लिए अनुमति जरूर रहती है। परन्तु असामाजिक और अनैतिक कामों पर सजा भी दी जाती है। शराब पीकर आने वाले को कड़ी सजा दी जाती है। उसे फौरन इलाके से बाहर कर दिया जाता है। मेले के समापन अवसर पर निःशुल्क भंडारा लगाया गया, जिसमें साफ सफाई पर खास ध्यान दिया जाता है। भंडारा से पूर्व स्थल की गोबर से लिपाई की गई थी, ताकि मक्खी मच्छर न आ सकें।   
मंदिर में केवल राम नाम की लिखावट 
गौरतलब है कि गांव में रामनामियों और राम-राम बड़े भजन (वार्षिक सम्मेलन) की मांग के लिए नारियल के साथ आवेदन पत्र दिए जाते हैं। जहाँ भजन बैठक होती है उस मंदिर में केवल राम नाम की लिखावट रहती है। राम की प्रतिमा नहीं रहती है। मंदिर के शिखर पर रामांकित श्वेत ध्वज हमेशा फहराता है। वाद्यरहित भजन-बैठक होती है। घुंघरूओं की झंकार के साथ रामधुन होती है। इसमें अनेक रामनामी सपरिवार शामिल होते हैं। रामनामी विधवाएं भी राम-नाम में लीन होने आती हैं। रामनामी महासभा के अध्यक्ष गुरू गोसाई इस भजन बैठक को संचालित करते हैं। तीन - चार रामनामी क्रमवार आकर थिरकते हैं। शेष बैठे रामनामी पुरुष और महिलाएं रामधुन में अपना सुर मिलाते हैं। रामचरित मानस का पाठ होता है। हर भजन बैठक के बाद प्रसाद बांटा जाता है। शाम ढलने के बाद की बैठक चरमोत्कर्ष पर होती है। राम-राम का विभिन्न लय में आरोह-अवरोह बेमिसाल रहता है। रामनामी पंथ के टीकाकार द्वारा पारी-पारी रामचरितमानस का पाठ भी अनूठा रहता है। पूजित  ग्रन्थ रामचरित मानस के सामने श्रद्धालु क्रमवार मत्था टेकते है। फिर रामनामी संतों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लेते हैं। सामने रखी राम दान पेटी में श्रद्धालु यथाशक्ति चढ़ावा भी भेंट करते हैं।    
दहेज़ बगैर सामूहिक विवाह की परम्परा भी जारी
राम राम बड़े भजन मेले की एक उपलब्धि यह भी है कि रामनामी समाज में बिना दहेज के सामूहिक विवाह की अनोखी परंपरा भी शुरू हुई है। विवाह के पहले वर वधु को रामनामी महासभा के निर्धारत शर्तों वाले प्रपत्र को भर कर (हस्ताक्षर सहित) पंजीयन करवाना पड़ता है। बाद में उस प्रपत्र को महासभा के अध्यक्ष मुहर लगाकर हस्ताक्षर कर स्वीकृत करते हैं। मसौदे के तहत पति-पत्नी परित्याग निषेध रहता है। शुरुआती कार्यवाही के बाद दोनों पक्ष से पुजारी द्वारा मात्र एक-एक नारियल लिया जाता है। दांपत्य जीवन में दाखिल होने के प्रमाण स्वरूप वर और वधु के माथे पर राम नाम का गोदनांकन किया जाता है। फिर रामचरितमानस को साक्षी मानकर उसे बीच में रखकर सात फेरे लिए जाते हैं। इस दौरान अभिभावक और अन्य लोग राम-नाम उच्चारित करते हैं। रस्म पूरी होने के बाद वर-वधु के लोग रामचरितमानस पर पच्चीस-पच्चीस रुपए वैवाहिक दक्षिणा बतौर चढ़ाते हैं। रामनामी पंथ में चैत्र मास की रामनवमी को विवाह होना अति शुभ माना जाता है। वैसे वार्षिक सम्मेलन में भी इसी तरह के आदर्श विवाह की प्रथा है। तब रामनाम लिखित जयस्तंभ (चबूतरा) क्षेत्र में विवाह रस्म पूरी होती है। यदि विवाह के बाद कन्या विधवा हो जाती है तो इसका पुनर्विवाह चूड़ी प्रथा द्वारा होता है, तब विवाह करने वाले व्यक्ति को रामनामी समाज को भांति (भोजन) देना पड़ता है। अभिभावक, पति, पत्नी और संतान की मृत्यु होने पर उसकी अस्थियां गंगा नदी के बजाय महानदी में ही विर्सजित की जाती है। शिवरीनारायण में माघ पूर्णिमा को सामूहिक रूप से स्नान करने की परंपरा भी है।

-आलेख और चित्र : दिनेश ठक्कर "बापा" 
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