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गुरुवार, 1 अगस्त 2013

रहस्य के आवरण में रूद्र शिव की प्रतिमा

ताला गांव वर्तमान में अपने विशिष्ट मूर्ति शिल्प के कारण न केवल देश में बल्कि पूरे विश्व में विख्यात हो चुका है। बिलासपुर से तीस किलोमीटर दूर स्थित पुरातात्विक स्थल पर जनवरी 1988 के दूसरे पखवाड़े में एक अद्वितीय उर्द्धरेतन प्रस्तर प्रतिमा खुदाई के दौरान प्राप्त हुई है। यह देवरानी मंदिर के मुख्य द्वार के समीप सोपान की दीवार से तीन फुट दूर 6 फुट की गहराई में मिली। लगभग 1500 वर्ष पुरानी यह प्रतिमा 9 फुट ऊंची एवं 5 टन वजनी है। शिव के रौद्र रूप को दर्शाने वाली यह प्रतिमा विलक्षण और द्वैत व्यंजना से परिपूर्ण है, जो विश्व मूर्ति कला के इतिहास में भी अनूठी है। 
पुरातत्व विभाग के पूर्व संचालक के.के. चक्रवर्ती के उत्खनन निर्देशन में पुरातत्व अधिकारी जी.एल. रायकवार एवं राहुल कुमार सिंह द्वारा देवरानी मंदिर के बाह्य भाग में ईंट की बंधान देकर क्षैतिजीय खनन करवाया गया था। 11 जनवरी से इस मंदिर के तीन तरफ ट्रेंच लेकर खुदाई शुरू की गयी थी। खुदाई के दौरान प्राप्त प्रतिमा दक्षिण - पूर्व की दिशा में मुंह के बल लेटी हुई थी। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग से चैन पुली की मदद लेकर इसे बाहर निकाल कर मंदिर की सीढिय़ों के समीप खड़ा कर दिया गया है।
उल्लेखनीय है कि लेमेटा स्टोन (फर्शी पत्थर) से निर्मित इस प्रतिमा के अंग- प्रत्यंग जलचर, नभचर और थलचर प्राणियों जैसे बने हैं। प्रतिमा के शिरोभाग पर पगड़ीनुमा सर्प सज्जित प्रभामंडल है, जबकि कान मयूराकृति के हैं। आंखें दानव आकार की हैं। भौंह तथा नाक छिपकिली सी बनी हैं। मूंछ मछली से बनायी गयी है, तो ठुड्डी केकड़े से । प्रतिमा की भुजाओं हेतु मगर का चयन किया गया है। हाथ के नख सर्पाकार हैं। वक्ष- स्थल पर दानव मुख उत्कीर्ण है। उदर के लिए मूर्तिकार ने गण- मुख का प्रयोग किया है। उर्द्धवाकार लिंग कच्छप मुख के सदृश्य है। जंघाओं पर चार सौम्य भाव वाली मुखाकृति भी बनायी गयी है।
पुरातत्व विभाग द्वारा इस प्रतिमा का काल निर्धारण मुख्यत: मूर्ति शिल्प और केश-सज्जा को दृष्टिगत रखते हुए किया गया है। यह प्रतिमा गुप्त काल के तुरंत बाद की है, अर्थात छठवीं सदी के शुरुआत की। इस प्रतिमा में गुप्तकालीन शिल्प-कला का प्रभाव ज्यादा प्रतीत होता है। प्रतिमा पर उत्कीर्ण केश, केश-सज्जा, वेशभूषा तथा आकार-प्रकार पूरी तरह गुप्तकालीन है।
नामकरण की असमर्थता
जहां तक प्रतिमा के प्रामाणिक नामकरण का सवाल है, तो इस मसले पर स्वयं पुरातत्व अधिकारियों ने असमर्थता जाहिर की है। केवल अनुमान के आधार पर इस प्रतिमा का नामकरण कर दिया गया है। उत्खनन निर्देशक के.के. चक्रवर्ती ने प्रतिमा का तादात्म्य शिव के रुद्र स्वरूप से स्थापित करते हुए लकुलीश मत के साथ संबद्ध होने की संभावना व्यक्त की है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डा. प्रमोद चंद्र ने भी इसे रुद्र-शिव की प्रतिमा होने का आंकलन किया है। कुछ पुरातत्वविदों ने इसे पशुपति की मूर्ति बताया है। परंतु इसमें भी विरोधाभास है। धर्मशास्त्रों के अनुसार, पशुओं को भी जीवात्मा के रूप में मानते हैं, जबकि पति को परमात्मा कहा गया है। पशुपति की मूर्ति में इसका मिलन है। पशुपति की मूर्ति में पशु साथ में दिखते हैं, न कि शरीर पर उत्कीर्ण रहते हैं, लेकिन ताला गांव की इस चर्चित प्रतिमा में पशु शरीर पर दिखाये गये हैं। समसामयिक प्रामाणिक जानकारी अनुपलब्ध होने से इस मूर्ति का रहस्य अनावृत नहीं हो पा रहा है।
साधारणतः शिव के सौम्य भाव वाली मूर्तियां पायी जाती हैं। परंतु रौद्र भाव की प्रतिमाएं बहुत ही कम मिली हैं। राज्य के विभिन्न स्थलों में अब तक गजारी, त्रिपुरांतर, काल भैरव, बटुक भैरव, उन्मत्त भैरव, वीरभद्र, कंकाल एवं अघोर जैसी रौद्र स्वरूप वाली मूर्तियां मिल चुकी हैं। लेकिन ताला गांव में प्राप्त मूर्ति का रौद्र स्वरूप अति विकट है। इसके समकक्ष की अन्य कोई प्रतिमा भी अब तक कहीं नहीं मिली है। प्रतिमा के अंग- प्रत्यंग भयावह होने के साथ-साथ रौद्रता को भी उजागर करते हैं। यों शिव को भूतेश भी कहा गया है। अतः प्रतिमा पर फन फैलाये नाग सर्प तथा शरीर पर अंकित गण का होना स्वाभाविक है। इस प्रतिमा को देख कर स्पष्ट होता है कि शिव के चरित्र में संहारमूलक और सृजनमूलक व्यवहार का एक साथ संजोग है। 
आकार-प्रकार की दृष्टि से भी यह प्रतिमा निराली है। यद्यपि करीब 14 फुट ऊंची एक विशाल मूर्ति विदिशा के पास नदी के अंदर से मिल चुकी है, लेकिन वह यक्ष-प्रतिमा है। 
शास्त्र के आधार पर निर्मित
ताला गांव में मिली प्रतिमा के पुरातात्विक विश्लेषण से ज्ञात होता है कि इसके निर्माण में केवल उर्वरा कल्पना शक्ति का ही सहारा नहीं लिया गया है, बल्कि मूर्तिकार द्वारा किसी शास्त्र को ध्यान में रखते हुए मूर्ति बनायी गयी है। साथ ही इसके द्वारा स्वयं के शिल्प कौशल का बखूबी इस्तेमाल किया गया है। अनुमान है कि उस समय आसपास तांत्रिक साधना का जोर रहा होगा, जिससे प्रेरित हो कर मूर्तिकार ने उपासना के लिए सौम्य रूप के बजाय रौद्र रूप वाली प्रतिमा तराशी होगी।
यह प्रतिमा ताला गांव के देवरानी मंदिर की है अथवा जेठानी मंदिर की, यह प्रश्न भी अभी अनुत्तरित है। प्रतिमा की स्थिति और उसके सुरक्षित रखे जाने की पूर्व हालत को मद्देनजर रखते हुए पुरातत्व अधिकारी यह बता पाने में सक्षम नहीं है कि प्रतिमा किस मंदिर में प्रतिष्ठित और पूजित रही होगी। उत्खनन निर्देशक के अनुसार, "आम तौर पर मूर्ति मंदिर के पास ही रखी जाती है। यद्यपि इस आकार की कोई दूसरी मूर्ति देवरानी मंदिर में नहीं मिली है, पर जेठानी मंदिर में ज्यादा मिली हैं। हालांकि रुद्र रूप शिव के गण देवरानी मंदिर की खुदाई में मिले हैं, परंतु प्राप्त प्रतिमा इस मंदिर की मुख्य मूर्ति नहीं हो सकती है।" उन्होंने यह भी कहा, "साधारणतः शिव मंदिर पूर्वाभिमुख रहता है। लेकिन जेठानी मंदिर दक्षिणमुखी है, जो कि अशुभ देवताओं के साथ संलग्र होता है। वैसे जेठानी मंदिर के वास्तु शिल्प को नये सिरे से आंकलित करने के बाद ही यह निश्चित हो पायेगा कि प्रतिमा किस मंदिर की है।" 
बहरहाल, खुदाई के द्वितीय चरण में इस प्रतिमा के खंडित हिस्से जैसे हाथ के नाखून, ऊपर का सर्प एवं पैर के पास का सर्प मिला है, जिसे एरलडाइट आदि से जोड़ दिया गया है। रसायन विशेषज्ञों के एक दल ने इस मूर्ति का परीक्षण कर उसमें आवश्यक संरक्षात्मक रसायन लगाये हैं। ताला गांव की महत्ता को देखते हुए अब इस प्रतिमा को इस स्थान पर सुरक्षित रखने का प्रबंध जरूरी हो गया है।
- दिनेश ठक्कर
(पत्रिका "धर्मयुग", मुम्बई के 25 सिंतबर 1988 के अंक में प्रकाशित)
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