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शनिवार, 6 जुलाई 2013

हिंदी सिनेमा में नृत्य : नाच ? कवायद ? कसरत ?


हिंदी फिल्मों में एक दौर ऐसा आ गया जब मजाक में यह कहा जाने लगा कि आधी फिल्म फाइट मास्टर "डाइरेक्ट" कर देते हैं, आधी फिल्म डांस डाइरेक्टर! फिल्म के डाइरेक्टर के लिए कुछ बचता ही नहीं। काफी हद तक यह मजाक एक सच्चाई भी था। और था क्यों, आज फिर कुछ एक अपवाद को छोड़ दें तो ऐसा ही हो रहा है। भारत शास्त्रीय नृत्य-कला की समृद्ध परंपरा की भूमि रहा है और भारतीय सिनेमा में इस परंपरा का प्रयोग करने वाले कलाकार भी कई हुए। गीत ही की तरह कुछ हद तक नृत्य भारतीय सिनेमा का एक अभिन्न अंग बन गया। और फिर समय के साथ यह भी मिलावटों, सांस्कृतिक हमलों, यहाँ तक कि सांस्कृतिक प्रदूषण का एक जरिया भी बन गया। प्रस्तुत है एक लंबी चर्चा हिंदी सिनेमा में नृत्य और नृत्य निर्देशन को लेकर .... 
     
हिंदी फिल्मों में नृत्य की अहमियत शुरू से रही है। हर दौर में इसे स्वीकार किया गया है। शास्त्रीय शैली के नृत्यों को हालांकि अब पहले की तरह तरजीह नहीं दी जा रही है। लेकिन लोक नृत्यों को फिल्मी अंदाज मे परोसा जरूर जा रहा है। पश्चिमों नृत्यों का बोलबाला आज भी है। शायद फिल्म वालों की यह मजबूरी बन गया है। तभी तो वे इससे उबर नहीं पा रहे हैं। ऐसे हालात में पुराने और नए नृत्य- निर्देशकों की सोच परस्पर अलग है। क्या वे इन स्थितियों से खुश हैं? क्या फिर से शास्त्रीयता के दायरे में नृत्यों का फिल्मांकन किया जाए? या यूं ही सब लोग भेड़चाल में शामिल हो जाएं? और कसरतनुमा नाच को पश्चिमी शैली का डांस मान कर संयोजन करते रहें। इन ज्वलंत सवालों पर हिंदी सिनेमा के प्रमुख नृत्य निर्देशकों और नृत्यांगनाओं के विचार यहां पेश हैं।
पहले डांसिंग हीरो का गौरव पाने वाले गोपीकृष्ण ऐसे डांस-मास्टर हैं, जिनके योगदान को फिल्म इतिहास में कभी भुलाया नहीं जा सकता है। नृत्य प्रधान फिल्मों के लिए आज भी गोपीकृष्ण (गोपी मास्टर) को याद किया जाता है। वर्ष 1955 में बनी वी. शांताराम  की बहुचर्चित फिल्म "झनक झनक पायल बाजे" बतौर नृत्यकार नायक उनकी पहली फिल्म थी। "शास्त्रीय नृत्यों की अधिकता के बावजूद दर्शक इस फिल्म से ऊबे नहीं, बल्कि इसी वजह से फिल्म खूब चली", नटेश्वर भवन ( मुम्बई ) में गोपीकृष्ण ने एक्सप्रेस स्क्रीन को यह बात गर्व से बताई। उन्होंने पुराने प्रसंगों का जिक्र करते हुए कहा, "झनक झनक पायल बाजे" के क्लाइमेक्स वाले तांडव नृत्य को मैं कभी नहीं भूल सकता। इसने मुझे बेहद लोकप्रियता दिलाई। जब यह फिल्माया जा रहा था तो मेरे अंग खून से सन गए थे। असल में हुआ यूं कि वे जल्दबाजी में मुझे पहनाए गए चमकीले पीतल के गहनों के पीछे कपड़ा लगाना भूल गए। इतना समय नहीं था कि डांस रोक कर उस पर वेलवट लगाएं। फिर नाचते- नाचते मेरी चमड़ी छिलती गई। खून निकलता गया। मेकअप मैन उसे पोंछता गया। इस फिल्म का राधाकृष्ण नृत्य भी अनूठा था। चक्करदार परन रोक कर मुझे मुद्राएं देनी थीं। जब रीटेक पर रीटेक हो रहे थे तो मैं पसीने से लथपथ हो गया। लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। बाद में इस नृत्य ने धूम मचा दी।"
इस फिल्म की कामयाबी के बाद गोपीकृष्ण के कैरिअर का ग्राफ ऊंचा उठता गया। फिल्म नाच घर (1959), छोटी सी मुलाकात (1961), फूलों की सेज (1964), जिद्दी (1964), आम्रपाली (1966), बायांनो नवरे सांभाला (मराठी-1974), महबूबा (1976), नाचे मयूरी (1986) की अपनी कोरियाग्राफी को भी वे विशिष्ट बताते हैं। फिल्म नाच घर का थाली नृत्य आज तक फिल्मी नृत्यकारों के लिए चुनौती बना हुआ है। नृत्यांगना- अभिनेत्रियों के ये पसंदीदा फनकार रहे हैं। फिल्म संग दिल के वक्त उनकी उम्र मात्र सोलह बरस थी। तब वे दुनिया के सबसे छोटे डांस मास्टर थे। इसमें उन्होंने मधुबाला से शास्त्रीय नृत्य करवाया था। इसके बाद मधुबाला ने वैसे स्टेप्स कभी नहीं किए। वैजयंतीमाला के वे प्रिय नृत्य निर्देशक रहे। उनके साथ बारह वर्ष तक काम किया। उनकी लगभग सभी फिल्में कीं।   
कला ही मकसद था
सनद रहे, फिल्म आम्रपाली ऐतिहासिक नृत्यांगना की जिंदगी पर केंद्रित थी। इस फिल्म के नृत्य- निर्देशन की तारीफ आज भी होती है। वैजयंतीमाला और सुशीला के मध्य नृत्य प्रतियोगिता का दृश्य संयोजन अनूठा कहा जा सकता है। यद्यपि वैजयंतीमाला ने कई फिल्मों में अनूठे स्टेपिंग दिए, परंतु आम्रपाली में तो उनकी नृत्य प्रतिभा अतुलनीय थी। नृत्य शॉट ओके होने से पहले वे घंटों रियाज करती थीं। उस जमाने में निर्माता- निर्देशक खुद चाहते थे कि शूटिंग में देर भले हो पर शॉट अच्छा होना चाहिए। व्यावसायिकता, कला पर हावी नहीं हो पाती थी। लेकिन आज मामला पलट गया। इसका मलाल गोपीकृष्ण को बेहद है। वे कहते हैं, "अब तो फिल्मों में व्यावसायिकता ने कला पक्ष को चौपट कर दिया हैं। इसमें मैं सभी को दोषी मानता हूं। आज एम टीवी देख कर कोई भी डांस मास्टर बन जाता है। इसीलिए आज की फिल्मों में बगीचे में जब गाना होता है तो उसमें हीरो- हीरोइन ऐसे नाचते हैं जैसे कोई बंदर- बंदरिया उछल-कूद कर रहे हों। आजकल का हीरो, हीरोइन को मुंह से लेकर पांव   तक ऐसे चाटता है, जैसे कोई कुत्ता सूंघ रहा हो, हीरो को कैसे नाचना चाहिए, यह वे कपूर खानदान से सीखें।"
तो मास्टर जी आप नृत्य-निर्देशन से क्यों मुंह मोंड़ रहे हैं? " क्या करूं, अब तो हमारा जमाना नहीं रहा। अब माइकल जैक्सन की तर्ज वाला वक्त है। क्लासिकल के लिए निर्माता-निर्देशक मुझे बुलाते ही नहीं है। इतने साल मर्यादित नृत्य किया है, करवाया है, तो अब मैं कैसे चड्डी उतार कर मैदान में आऊं। मतलब मैं अश्लीलता को कैसे महत्व दूं। हालांकि पश्चिमी नृत्य को मैं उतना बुरा नहीं कहता हूं। लेकिन हिंदी फिल्मों में जिस रूप में वह दिखाया जाता है, भौंडा होता है। माइकल जैक्सन जो डांस करता है, वह वलगर नहीं लगता है, पर यहां उसकी नकल बेहूदा लगती है। कथक के तोड़े-टुकड़े तो फिर कलाकारों की समझ से बाहर हैं। वन-टू-थ्री-फोर के जरिये वे किसी तरह हाथ- पांव हिला लेते हैं और उसे ही डांस समझ कर खुश हो लेते हैं। श्रीदेवी, मीनाक्षी शेषाद्रि, सुधा चंद्रन, कमल हासन जैसे लोग अब कहां आ रहे हैं।" 
गोपीकृष्ण का दुखड़ा सही है। लेकिन दूसरी तरफ अब नृत्य निर्देशकों के संजोजन कराने का तरीका भी तो बदल ही गया। उनकी सोच में भी फर्क आ गया है। बदलते समय से उन्हें समझौता करना पड़ रहा है। निर्माता-निर्देशक के आदेश पर कोरियोग्राफी हो रही है। पहले हालात इसके विपरीत थे। वर्ष 1940 के आसपास अजुरीबाई के नाम का डंका बजता था। वे शास्त्रीय और पश्चिमी नृत्यों में पूरी तरह पारंगत थीं। उनकी बात काटने की हिम्मत किसी में नहीं थीं। फिर मोरे मास्टर की तूती बोलने लगी। वे शास्त्रीय और लोक नृत्य के बेहतर निर्देशक थे। फिल्म अजीब लड़की में "लारी लप्पा लाई रे..." गीत में मोरे मास्टर ने खुद भी नृत्य किया था। 
भारतीय शास्त्रीय नृत्य को विदेशों में लोकप्रिय बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया उदयशंकर और उनके ट्रुप ने. मंच के प्रति प्रतिबद्ध उदयशंकर ने शास्त्रीय नृत्य को बढ़ावा देने के लिए सिनेमा के सशक्त माध्यम का प्रयोग करने का फैसला किया तो उनका यह प्रयास फिल्म "कल्पना" के रूप में सामने आया।
पश्चिमी नृत्यों की नकल
इसके बाद ज्ञान शंकर, कृष्ण कुमार आए। वर्ष 1951 में कृष्ण कुमार हिंदी फिल्मों में रंभा-संभा लाए। इनके छोटे भाई सूर्यकुमार ने भी पाश्चात्य किस्म को अपनाया। ज्ञान मंडलोई, गोपीकृष्ण, बद्रीप्रसाद, सत्यनारायण, सोहन खन्ना, सोहन लाल, हीरालाल (दक्षिण भारत के), पी. एल. राज, सुरेश भट्ट, हरमन, कमल, माधव किशन के बाद आने वाली नृत्य-निर्देशकों की नई पीढ़ी शायद शास्त्रीयता से दूर रहना चाहती है। इस नई पीढ़ी को ज्यादा लगाव वेस्टर्न पैटर्न से है। लोक नृत्यों का फिल्मांकन भी वे पश्चिमी अंदाज से कर रहे हैं। नई पीढ़ी में अभी सरोज खान, रेखा और चिन्नी प्रकाश का नाम तथा काम सबसे आगे है। इसके पश्चात तरुण कुमार, विजय, आस्कर, हबीबा रहमान, किरण कुमार, सुमन सरकार, कमलनाथ, चंदा, गणेश, महेश- नरेश, नायडू, पप्पू खन्ना, तारा, लक्ष्मी, बाबा हरमन, शैलेष कुमार, जय बोडें, निमेष और राजू खान (सरोज खान के पुत्र) का क्रम आता है। ( जारी ) 
- दिनेश ठक्कर
(इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के हिंदी फिल्म अखबार "एक्सप्रेस स्क्रीन", मुम्बई के 3 दिसम्बर 1993 के अंक में आवरण कथा बतौर प्रकाशित)    

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